आप सत्कर्म भगवान को समर्पित कर सकते हो पाप कर्म नहीं। कोई यदि यह सोचे कि अच्छे बुरे करते रहो दिन भर और शाम को लौटकर मंदिर में जाये भगवान को कह दें- “कायेन बाचा मनसेन्द्रियेर्वा” कायिक, वाचिक, मानसिक जो भी हमारे कर्म के बंधन से मुक्त हो जाएंगे, ऐसा बिल्कुल मत समझना। चोर चोरी करेगा, डाका डालेगा और शाम को मंदिर जाएं, कहे भगवन हमारे मन वाणी इंद्रियों से कर्म बने हैं वो सब आपको समर्पित है। लेकिन चोरी करके जो धन लाया है वह समर्पित नहीं करेंगे। भगवान को सत्कर्म समर्पित किया जा सकता है। दुष्कर्म का फल तो दुख को भोगना पड़ेगा। राजा ने अगर कुछ इनाम दिया तो आप उसे लौटा सकते हैं, पर राजा ने यदि कुछ सजा दी है तो आप उसे वापस नहीं कर सकते यह तो आपको ही भुगतनी पड़ेगी। भगवान ने सुखिया पर कृपा की निष्काम कर्म का फल है भक्ति। सुखिया धन्य हुई।
भक्ति का धन आया जिसके जीवन में वही हकीकत में सुखी है, धनवान है। भगवान अपने धाम को छोड़कर ऐसे भक्त के पास आते हैं। क्योंकि भगवान भी भक्तिसूत्र में बंधे हैं। भगवान भक्ताधीन है, जगत भगवान पर आधीन है। सुखिया पर भगवान ने अनुग्रह किया।
बाबा नंद और ग्वाल बाल सभी बैल गाड़ी में घर का सामान रख रहे हैं। सब गोपियाँ भी अपने अपने बच्चों को लेकर बैलगाड़ी में बैठीं और गायों के वृंद को लेकर सब ग्वाल गोकुल को छोड़ कर चले। गोकुल से वृन्दावन की दूरी 26 km है। आये वृन्दावन, वहां बसाई बस्ती। वृन्दा याने तुलसी, और वन इसलिए इसका नाम वृंदावन। अब वृन्दावन की शोभा देखने चले श्रीकृष्ण और दाऊ अपने मित्रों के साथ, वृंदावन की शोभा देखते ही भगवान अति प्रसन्न हो गए। गोविंद को तुलसी अति प्रिय है, फिर यह तो तुलसी का वन है।
कन्हैया, दाऊ दादा से बोले- दादा यहां घूमने का मन कर रहा है। चलो ऐसा करते हैं दादा गाय चराएँ, तो माँ और बाबा इस तरह से घूमने तो नहीं जाने देंगे। कहेंगे जंगल है बच्चों को नहीं जाना चाहिए। लेकिन यदि हम गाय चराएँ तो हमें घूमने को मिलेगा। तो आए श्रीकृष्ण और दाऊ बाबा नंद के पास और बोले बाबा हम तो ग्वाल है न, हम तो अब बड़े हो गए हैं। हम भी गाय चराएंगे। माता जसोदा ने कहा- बेटा! तुम अभी बहुत छोटे हो तुम गायों को सम्हाल नहीं पाओगे। पर जब बहुत जिद की तो कहा- अच्छा ठीक! अभी बछड़ों को लेकर तुम जाओ, बछड़े चराओ। बछड़े भी छोटे हैं, तुम भी छोटे हो! तुम गायों को सम्हाल नहीं पाओगे। पर जब बहुत जिद की तो कहा, अच्छा ठीक अभी बछड़े को लेकर तुम जाओ, बछड़े चराओ। बछड़े भी छोटे हैं तुम भी छोटे हो। कन्हैया ने कहा- दाऊ बछड़े तो बछड़े हैं चलो घूमने को तो मिलेगा। कन्हैया अब बछड़े चराने लगे।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें