सोमवार, 16 दिसंबर 2024

यमलार्जुन की स्तुति(भाग 2) 98

वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां, हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोर्नः।
स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत्प्रणामे, दृष्टिः सतां दर्शनेsस्तु भवत्तनूनाम्।।

हे नाथ! हमारी वाणी आपके गुण कथन में लगी रहे। कान सदा आपके कथा श्रवण में लगे रहे। हे दामोदर! नेत्र सदा दर्शन करें। हमारे हाथ सदा आपके पूजा में लगे रहे। हमारे पैर तीर्थ यात्रा करें और मस्तक सदा आपको नमस्कार करें। हमारी सब इन्द्रियां आपकी सेवा में लगी रहे। हे भगवान! जब इन्द्रियां आप को छोड़कर अन्यत्र जाती है तब ही पाप की संभावना बढ़ती है। इस प्रकार भगवान से भक्ति की मांग की याचना, भगवान से लौकिक सुख माँगना! मूर्खता है। 

बादशाह किसी किसान पर खुश हो! मांग तुझे क्या चाहिए। तो वह बादशाह से धन छोड़ कर एक बैलगाड़ी भूसा मांगे, तो यह उसकी मूर्खता नहीं है क्या?.. इसी प्रकार भगवान से लौकिक सुख मांगना भूसा मांगने जैसी मूर्खता है। एक भक्त मंगलवार का व्रत करता था रोज़ हनुमानजी के मंदिर जाता और कहता है। हनुमान जी! मुझ पर कृपा करो… मुझे सिर्फ एक लाख रुपए चाहिए। सिर्फ एक लाख रुपए दीजिये। अब हनुमान जी तो हनुमान जी हैं, हर सिद्धि उनके पास हैं। माता जानकी जी ने वरदान दिया। 
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता। 
अस वर दीन्ह जानकी माता।। 

मैं हर शनिवार को एक पांव तेल चढ़ाऊंगा, मंगलवार को चोला चढ़ाऊंगा। एक माह तक प्रार्थना करता रहा तो हनुमान जी को बड़ा गुस्सा आया। मूर्ख मेरे पास एक लाख होता तो तू एक पांव तेल चढ़ाएं, इससे अच्छा तो यह होता न कि मैं खुद तेल का तालाब बनाकर उनमें तैरता रहता। 

भगवान से लोकिक सुख मांगना तो तुच्छता है, मूर्खता है। नलकूबर और मणिग्रीव ने नन्द नंदन की स्तुति की शाप मुक्त हो दोनों अपने धाम चले गए। दोनों वृक्ष जब जमीन पर गिरे तो आवाज सुनकर नन्दादि सब ग्वाल दौड़कर आए। श्रीकृष्ण को बंधा था ऊखल, नंदबाबा ने छोड़ा। सोचा ये वृक्ष गिरे कैसे?.. अगर ये वृक्ष कन्हैया पर गिरते तो क्या होता। यहाँ तो बहुत अनिष्ट हो रहा है, कंस के सेवकों ने बहुत उपद्रव मचाया है। अब तो यह स्थान छोड़कर कहीं जाना पड़ेगा, गोकुल छोड़ने का निर्णय लिया गया। तभी उप नंदा ने बताया बाबा! यहाँ से थोड़े दूर वृन्दावन है, वह बड़ा दिव्य वन है। वहाँ हमारी गायों को घास भी मिलेगी, पास में ही गोवर्धन है यमुना है। पूर्ण निर्णय होगया कि अब गोकुल को छोड़कर वृंदावन में बसेंगे। 

तब सुखिया आई है, फल बेचने उसको नन्द नंदन के दर्शन करने की बड़ी इच्छा थी। इसका नाम सुखिया है, पर इस संसार में सुखिया हैं कौन?.. सब दुखिया है। बोले- जो कर्म तो करते हैं, साथ कर्म के पौधे को पुरुषार्थ का जल पिलाए फिर कर्म के पौधे पर जो फल लगे, उसे भगवान को समर्पित कर दें। यानी ऐसा निष्काम कर्म करने वाला साधक ही सुखिया है, बाकी दुखिया है। कर्म करो कर्म के पौधे लगाओ और पुरुषार्थ का पानी भी पिलाओ पर जब फल आए, तो फल भगवान को समर्पित करो।

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