शुक्रवार, 19 जून 2026

ब्रह्मा जी को मोह 102

जयघोष हुआ वृन्दावन में पर आवाज पहुंची ब्राह्मा जी के पास, देवताओं से पूँछा!.. क्या हुआ?.. तो बताया! आपको नहीं पता? वृज में भगवान का प्राकट्य हुआ है। उन्होंने वत्सासुर, वकासुर और आज अघासुर को मारा है। ब्रह्मा जी बोले- तब तो दर्शन करने मुझे भी चलना चाहिए।

चले ब्रह्मा, ब्रह्म का दर्शन करने, पर ह्रदय को साथ लाना भूल गए, सिर्फ बुद्धि लेके आए। इसलिए उनकी बुद्धि में शंका हुआ। यहाँ भगवान वन में एक वृक्ष के नीचे अपनी सखा मण्डली के साथ बैठे हैं। अघासुर मारकर अभी घर नहीं गए, सब अपने घर से भोजन लेके आए थे। इस समय कन्हैया 5 वर्ष के हैं। इनमे एक मधुमंगल नाम का सखा है, यह ब्राह्मण बालक है। गरीब है माता यशोदा ने कहा था की तुम रोज यहाँ आकर खालिया करो कन्हैया के साथ तो वह रोज कन्हैया के घर भोजन किया करता, पर आज कन्हैया ने कहा ये मधुमंगल तू रोज मेरे घर खाता है कभी अपने घर का भी तो मुझे खिला, तो आज मधुमंगल ने अपनी माँ से कहा माँ कन्हैया ने कहा है, कल हम वन में भोजन करेंगे, तू अपने घर से कुछ लेके आना। तो कल कुछ अच्छा सा बना देना। माँ की आँख में आंसू आगये, बेटा घर में कुछ है ही नहीं, तो क्या बना कर दूँ। घर में खाने को होता तो तुझे कान्हा के घर क्यों जाने देती। तुझे अपने हाथों से बनाकर न खिलाती। ऐसा समझा कर माँ ने उस बालक को सुला दिया।

सुबह स्नान कराके तैयार कर दिया। मधुमंगल ने एकबार फिर बोला माँ मैं तैयार हो गया। 

क्या तुमने कुछ बनाया?..

तप अपने पुत्र को शांत करने के लिए माँ ने क्या किया, बहुत दिनों की रखी छाँछ जो बहुत खट्टी थी, उसे दे दिया की ले जाओ। मधुमंगल ने कहा – माँ वह मुझे ताज़ी छाछ खिलाता है और मैं उसे खट्टी छाछ पिलाऊँ। मेरे मित्र मुझ पर हसेंगे। माँ ने कहा – तुम एक काम करना यह किसी को मत देना, कहना यह मुझे मेरी माँ ने दिया है, किसी को नहीं खिलाऊँगा और ऐसा स मझाकर माँ ने अपने बच्चे को वन में भेज दिया। सब ग्वाल आये, यमुना किनारे बछड़े चारण कर रहे थे। तब भगवान ने अघासुर को मारा, फिर लगी सबको भूंख तो बट वृक्ष के नीचे बैठगाये। अपने अपने घर से जो लाए थे सब निकालने लगे और कन्हैया को देने लगे। 

गोपियों ने कहा था बेटा अकेले मत खाना, पहले कन्हैया को खिलाना। तो कन्हैया यहाँ सबका भोजन चखते है और प्रशंसा करते हैं। 

वाह तुम्हारी माँ के प्रेम की तरह यह भोजन भी मीठा है। सब मिल बांटकर खा रहे है तब मधुमंगल अकेले पेड़ के पीछे छिप कर सोचने लगा। मैं क्या खिलाऊं कन्हैया को, यह खट्टी छाछ! और खिलाता हूं तो कहेगा यह क्या लेकर आया। भगवान अपने घरसे दहीभात लेकर आये हैं, जब खाने लगे तो याद आया अरे मधुमंगल कहाँ है?.. याद क्यों आई? क्योंकि मधुमंगल रोज कन्हैया के साथ खाता है।

मित्रों ने बताया पता नहीं अभी तो यहीं था। भगवान ने आवाज लगाईं और उधर मधुमंगल जल्दी जल्दी खट्टी छाछ को पीने लगा। मन में यह सोच रहा है यदि कन्हैया ने देखा तो मांगेगा और यह खट्टी छाछ उसे मैं कैसे दूँ। यह भक्त का भाव है, हम अच्छी अच्छी चीजें खरीद के खाते हैं और मंदिर में चार चरौजी का भोग लगाते हैं। फटी नोट जिसे एक भिकारी भी नहीं लेता उसे मंदिर की आरती थाली में छोड़ जाए ऐसी भक्ति मधुमंगल की नहीं है।

अच्छी से अच्छी चीजें भगवान को समर्पित करनी चाहिए। अब हम तो खाते है, बासमती चावल! और जब घर में सत्यनारायण की पूजा हुई तो कौन सा देते है पुराना मोटा चावल, यह हमारी भक्ति की भावना है। हम तो खाते है बड़ी सुपारी पर पूजा में आएगी सस्ती छोटी सुपारी जो किसी काम की नहीं, उसका नाम ही रख दिया गया, पूजा की सुपारी। धोती लाएंगे तो ऐसी के पूछो ही मत, दुकान वाला बोलेगा ब्राह्मण को तो ऐसी ही चलेगी। आप ब्राह्मण को ला रहे हो या भगवान को?.. यदि खरीदते समय ब्राह्मण को दृष्टि करोगे तो भगवान स्वीकार नहीं करेंगे। ब्राह्मण को देने वाले भगवान है तुम्हे तो भगवान के लिए लेना चाहिए और भगवान के लिए उत्तम से उत्तम, यदि नहीं है तो “अभावे अक्षतम समर्पयामी” और जब भगवान ने दिया है, एक हजार की पीताम्बरी पहन के बैठे हो तो भगवान के लिए 100 की क्यों?..

जो उत्तम वस्तु है वह भगवान को समर्पित करें। सेवा कम करो पर अच्छा करो। 

मधुमंगल छाछ पीने लगा तभी भगवान उसके पास आये, इतनी देर में उसने पूरी छाछ मुंह में भरली। अच्छा वहाँ हम सब बाँट कर खा रहे है और तू दारीके चुपके चुपके पाय जा रओ है। बता क्या छिपा राखो है मुख मे। मधुमंगल ने छाछ भरी है मुख में ज्यादा तो वह निगलते भी ना बने तभी कन्हैया ने गाल में मरी मुक्का तो सारा छाछ कन्हैया के मुख में। अच्छा तो छाछ लायो है, यह तो बड़ी अच्छी है और कन्हैया मधुमंगल के मुख को चाटने लगे। मित्र इतनी बढ़िया छाछ लाये हो और अकेले पी रहे हो मुझे दिया भी नहीं। 

कन्हैया तुम्हे देने को हमारे पास कुछ नहीं है बहुत दिनों की खट्टी छाछ रखी थी उसी को माँ ने दिया। भला मैं यह तुम्हे कैसे देता। 

कन्हैया ने कहा- अरे मधुमंगल तुम कहते हो तुम्हारे पास कुछ नहीं हैं! अरे तुम्हारे पास जो है वह किसी के पास नहीं है। यह भाव की “खट्टी छाछ मैं कृष्ण को नहीं पिलाऊंगा” तुम्हारे पास यह जो भाव है, वह तो अन्य के पास नहीं है। 

चलो मित्र इस तरह से रोते नहीं, क्या खट्टी छाछ पीकर ही दिन काटोगे! चलो भोजन करो। ले आए मधुमंगल को अपने साथ बैठाया, बायां हाथ डाल दिया मधुमंगल के कंधे में! देखो तो यह “सखा भाव” बायां हाथ डाला कंधे में और दाहिने हाथ से दही भात का कवल लेकर खिलाया मित्र को, लो मित्र खाओ। कृष्ण के कंधे पर सर रख के मधुमंगल बहुत रोया। 


अब ये लीला देखी ब्रह्मा जी ने कि एक जवाल के मुंह लगी खट्टी छाछ को जीभ लगाकर चाट रहे हैं। ये कोई कैसे ब्रह्म है. यह समझने के लिए ब्रह्मा जी ने सब बछड़ों को चुरा कर छिपा दिया। अब ग्वालों ने देखा बोले- कन्हैया! सब बछड़े कहाँ गए?.. कन्हैया ने कहा- तुम सब भोजन करो, मैं बछड़ों को लेकर आता हूँ। यहाँ फिर ब्रह्मा आए और ग्वालों को भी चुरा कर छिपा दिया। बछड़े तो मिले नहीं, जब कृष्ण वापस आएँ तो ग्वाल भी नहीं है। अरे लगता है वृन्दावन में कोई बड़ा चोर आया है। अंतर्यामी है, देखाकि यह काम तो ब्रह्मा जी का है, अरे बूढ़े बाबा हम बच्चों को क्यों परेशान करते हो। 


जब शाम हुई तो श्याम ने देखा अब घर भी जाना है और ग्वाल बाल बछड़ों को ब्रह्मा जी ले गए क्या किया जाए घर जाएंगे तो गोपी पूछेंगी, कि हमारे बच्चे कहाँ गए तो क्या बताऊँगा। तब भगवान ने संकल्प मात्र से ही उतने ही ग्वाल और उतने ही बछड़े बनाए। एक ही अनेक बने और लौट आए अपने घर, सब गोपियां अपने बछड़े और बच्चों को लेकर घर चली जाती है। सुबह जाते हैं शाम को आते हैं। ऐसा एक वर्ष तक चला पर किसी को संदेह भी नहीं हुआ। 


अरे राजा परीक्षित! इस एक वर्ष में गोपियों को पहले से भी ज्यादा प्रेम हुआ अपने बच्चों पर और गाय को अपने बछड़ों पर और यहाँ ब्रह्मा ने सोचा अब चलो वृंदावन में देखा जाए वहाँ क्या हो रहा है। देखा तो वही बांकेबिहारी वहीं ग्वाल वहीं बछड़े सब एक साथ खेल रहे हैं चकित हुए। कि फिर मैं जिन्हें ब्रह्मलोक ले गया वो कौन थे फिर से ब्रह्मा लोक गए तो वहाँ वही बच्चे और वही बछड़े तब ब्रह्मा जी को ज्ञान हुआ कि ये तो सच मुच ब्रह्म है सब ग्वालों और बछड़ों को लेकर आए और कृष्ण को सौंप दिया और क्षमा प्रार्थना करी।

नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय गुञ्जावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय। 

वन्यस्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु 

लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाङ्‌गजाय ॥१॥


अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य 

स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि।

नेशे महि त्ववसितुं मनसाऽन्तरेण 

साक्षात्तवैव किमुतात्मसुखानुभूतेः॥२॥

प्रभु आज मुझे आपकी प्रभुता का ज्ञान हुआ। मैं अपने संकल्प से सृजन करने में असमर्थ हूँ और आप अपने संकल्प से सृष्टि का सृजन करते हैं। मेरे इस अपराध को क्षमा करिये। ब्रह्मा का मोह दूर हुआ और यहाँ पृथ्वी में एक वर्ष बीत गया। 


कन्हैया अब छ: वर्ष के हो गए हैं। एक कल्प का ब्रह्मा का दिवस है न, तो वहाँ तो रात हुई ही नहीं! और यहाँ एक वर्ष बीत गया। ग्वालों को अभी भी भ्रम है, की हम आज ही वन में भोजन कर रहे थे। एक वर्ष के बाद ये सब ग्वाल बछड़े अपने घर को आए, लगा यह सब आज ही हुआ है; तो घर में जाकर अपनी माताओं से बताया, मैया¡ कन्हैया ने आज ऐसी लीला की और अघासुर को मारदिया। तो मारा था एक वर्ष पहले और आज उसकी चर्चा कर रहे हैं, इस प्रकार ब्रह्मा जी का भी मोह दूर किया। 

।।बोल बालकृष्णलाल की जय।।



गुरुवार, 18 जून 2026

अघासुर का उद्धार 101

वकासुरु के बाद भगवान ने अघासुर को मारा! अब अजगर के विनाश की कथा है। अज अर्थ है बकरा का, गर याने निगल जाना। ऐसा प्राणी जो बकरे के पूरे शरीर को भी निगल जाए, वह है अजगर। 

मुंह खोलकर पड़ा हुआ है। तब एक दिन ग्वाल सब घूमते हुए बछड़ों को चराते हुए वहां आए, देखा तो सोचा यह कौन सी गुफा है?. वृन्दावन में कभी ऐसी गुफा तो देखी नहीं। एक ने कहा- कन्हैया! हमने सुना है की ऐसे ही गुफाओं में बड़े बड़े संत तपस्या करें, चलो इसके अंदर चलकर देखते है। 

सब दौड़े तो कन्हैया ने रोका! पर ग्वालों ने बिल्कुल न सुनी। अब जैसे उसके जीभ पर कदम रखा और भीतर पहुंचे, तो एक ने कहा- भईया! या वृन्दावन के महात्मन के तो बड़े ठाट बाट है। ऐसी सड़क बनाई है जैसे गद्दा बिछाए हो। जब द्वार पर इतनी व्यवस्था है तो अंदर कितनी सुंदरता न होगी। लम्बे लम्बे दाँत चारो तरफ थे, तो एक ने पूछो क्यों रे, ये लम्बे लम्बे सफ़ेद खूंटा काय को गाड़ राखे है। दूसरे ने कहा – अरे तुम्हे नहीं पता बाबाओं के विचित्र नियम भी होते है, यह उनका नियम होगा की बाहर से जो भीतर आये वह अपना सामान खूंटा में ही टांग दो, भीतर लेके जानो नहीं है। तो साथ में जो लिया था सबने उसी दाँत के खूंटे में टांग दिया। 

अब आगे बढे तो एक ने कहा – भैया मकु तो डर लागे है, यदि यह भी वकासुर की तरह कोई दानव हुआ तो?.. दूसरे ने कहा – तो चिंता क्यों करते हो हमारे पीछे कन्हैया है न, उसी वकासुर की भांति इसे भी मार देगा। यहाँ भक्त को पूरा विश्वास है की परमात्मा हमारी रक्षा अवश्य करेगा। जीव कर्म करे डरे नहीं और अपना कर्म परमात्मा पर समर्पित करे तो भगवान काल गाल से तो क्या उसके पेट में जाकर भी बचाते हैं। भगवान ने देखा भक्त तकलीफ में है, तो स्वयं अंदर चले गए, भक्त को बचाने का संकल्प भगवान का है। भगवान अंदर पहुंचे और उसके स्वास मार्ग को अवरुद्ध कर दिया और अघासुर मारा गया। भगवान ने सबको बाहर निकाला और अघासुर के देह से दिव्य तेज निकला और भगवान में समागया। यह दृश्य देखने आकाश में देवता भी आये, पुष्प वर्षा करी ग्वालों ने जय जयकार किया।

बोल वृन्दावन बिहारी लाल की जय।


रविवार, 13 जुलाई 2025

वत्सासुर वध 100

एक बार बछड़ों को लेकर गए भगवान मित्रों के साथ, बछड़े सब चर रहे थे। भगवान अपने मित्रों के साथ खेल रहे थे। तभी बत्सासुर आया बछड़े का रूप लेकर, बत्सासुर ने सोचा- कृष्ण बछड़ों में मोहित हैं और मैं भी यदि बछड़ा बन कर जाऊं तो कृष्ण मुझ पर भी मोहित हो जायेंगे, तब मैं उनको मार दूंगा। 
लेकिन उनका तो नाम ही मोहन है, सबको मोहित करने वाले खुद मोहित होने वाले नहीं। पहचान लिया कन्हैया ने कहा- दादा! देखते हो उस बछड़े को ये बछड़ा अपना नहीं है और सुन लो यह बछड़ा भी नहीं है। मैं इस दुष्ट को जानता हूँ यह बत्सासुर है, असुर है, बछड़े का रूप लेकर आया है। वह आया है मारने के लिए लेकिन अभी इसे मज़ा चखाता हूँ। गए हैं भगवान धीरे-धीरे उसके पास और उसके माथे पर हाथ फेरा तो बत्सासुर को लगा कि यह फंसा, तब कन्हैया हंसे बेटा तू फंसा देख अब मैं क्या करता हूँ, हाथ फेरते हुए गए पीछे की ओर। बत्सासुर तो मौका ढूंढ रहा था, कि कब इसको खत्म कर दूं। लेकिन पहले तो मोहन ने ही मौका प्राप्त किया पीछे गए और पीछे वाले दोनों पैर पकड़कर ऐसे घुमाया और पछाड़ा एक वृक्ष में की बत्सासुर के प्राण निकल गए। सब ग्वाल नाचने लगे- बोले वृंदावन बिहारी लाल की जय! 

बत्सासुर को मारने के बाद भगवान ने बकासुर को मारा यह बकासुर पूतना का भाई था। भगवान काया को नहीं देखते, भाव को देखते हैं, हृदय को देखते हैं। बत्सासुर का ही रूप लेकर आया था और वत्स में मिल गया, वत्स का अर्थ प्रिय भी होता है और भगवान तो प्रिय यानी वैष्णव की रक्षा करते हैं उन्हें चराते हैं। उनका पोषण करते हैं और उसका रक्षण करते हैं। वैष्णवों की रक्षा करने वाले हैं भगवान! तो वत्स ने क्या किया?.. वैष्णव वृन्द में वत्स का रूप रखकर घुस गया। तिलक लगाया, रामनामी, पीतांबरी पहन ली दो चार माला पहन लिया। परंतु भगवान बाहरी रूप को नहीं देखते वो अंदर बैठे है न सबके, इसलिए अंदर की बात को जानते हैं कि यह वत्स नहीं, यह संत वैष्णव नहीं यह तो राक्षस है। ढोंगी पाखंडी हैं। तो भगवान ने क्या किया?.. उसे खत्म कर दिया। सच में उसे वैष्णव बना दिया और उसे मुक्ति दे दी। पाखंडी को मारते हैं मतलब उसके असुरत्व को खत्म करते हैं और सदा के लिए बैष्णव बनाकर अपने पास स्थान देते हैं। इस प्रकार बत्सासुर मारा गया। अब वहाँ से आए यमुना तट पर वहाँ बैठा था बकासुर बगुले का रूप लिए, कृष्ण कन्हैया को देखते ही उसे बड़ा क्रोध आया। कि इसी ने मेरी बहन पूतना को मारा है, अब इसे मार कर मैं बदला लूँगा। दौड़ता हुआ आया वह भयंकर बगुला चोंच से उठाया श्रीकृष्ण को और खा लिया। मूर्ख हैं वह, यदि कृष्ण बहुत प्यारे लग रहे हैं तो उनका नाम मुख में लेना चाहिए न कि कृष्ण को ही मुख में ले। अब खाना एक बात है और पचाना दूसरी बात। पेट में जलन होने लगी सहन नहीं हुआ तो उसने वमन कर दिया। फिर भगवान ने उसके दोनों चोंच पकड़कर बीच से दो हिस्से कर दिए और बकासुर मारा गया। सब ग्वाल बाल उत्साहित हो कृष्ण की जय-जय कार करते सब लौटकर आए। शाम का समय था, रात्रि में भोजन किया और सो गए। 

अब सुबह हुआ भोर काल में ही बाबा नन्द गाय दुहने पहुंचे। यह गाय गंगी गाय है, जो कन्हैया को बहुत पसंद है। कन्हैया इसी का दूध पीते थे। बाबा गाय का दूध निकाल रहे थे कि तभी कन्हैया वहाँ पर पहुंचे, बोले- बाबा! मैं भी गाय को दुहुंगा। 


बाबा ने कहा- बेटा! तनिक बड़े हो जाओ फिर गायों को दुहना बाबा तो बैठे हैं। तभी कन्हैया ने अपनी एड़ी उठाई और दोनों हाथ ऊपर किए और इस प्रकार वे बाबा की पगड़ी से अंगुली भर ऊंचे रहे बाबा से कहने लगे बाबा ज़रा देखो तो सही मैं तो सही में आपसे भी बड़ा हो गया। बाबा ने कहा- हां! बेटा बड़े तो हो, पर गइया नहीं दुहोगे। कन्हैया ने सोचा यहां तो बात नहीं बनी, चलो मइया के पास चलते हैं। मईया ने भी मना कर दिया और कहा- कन्हैया! अगर गइया पैर मार दे, कहीं चोट लग जाए तो तुम रोने लग जाओगे। तुम बड़े हो जाओ फिर गइया दुहना। कन्हैया ने सोचा यहाँ भी बात नहीं बनी अब कन्हैया ने सोचा बाबा बड़े हैं तो बड़ी गइया।

मैं छोटा हूँ तो छोटी गाय दुहूंगा।

कन्हैया धीरे से एक वर्तन उठाया और गऊ शाला में पहुंचे, जहाँ दूध पीनेवाली छोटी बछिया बंधी हुई है। एक हेमा नाम की बछिया की पीठ थपथपाई और दूध दुहना शुरू किया, अब बछिया तो स्वयं अपनी माँ का दूध पीती है, उसको दूध कहाँ से आएगा। फिर मन में सोचा इसको दूध क्यों नहीं आरहा? फिर सोचने लगे!.. ओहोअभी बछिया तो छोड्यो नाय। चारो ओर देखने लगे की मेरी बछिया का बछड़ा कहाँ गया?..  अब बछड़ा हो तो मिले। फिर सोचने लगे कौन झंझट में पड़े, मैं ही थोड़ी देर के लिए बछड़ा बन जाता हूं। और इस प्रकार भगवान अपने हाथो को नीचे किया और अपनी बछिया का दुग्धपान करने की लीला करने लगे। 

शनिवार, 22 मार्च 2025

वृन्दावन प्रस्थान 99

आप सत्कर्म भगवान को समर्पित कर सकते हो पाप कर्म नहीं। कोई यदि यह सोचे कि अच्छे बुरे करते रहो दिन भर और शाम को लौटकर मंदिर में जाये भगवान को कह दें- “कायेन बाचा मनसेन्द्रियेर्वा” कायिक, वाचिक, मानसिक जो भी हमारे कर्म के बंधन से मुक्त हो जाएंगे, ऐसा बिल्कुल मत समझना। चोर चोरी करेगा, डाका डालेगा और शाम को मंदिर जाएं, कहे भगवन हमारे मन वाणी इंद्रियों से कर्म बने हैं वो सब आपको समर्पित है। लेकिन चोरी करके जो धन लाया है वह समर्पित नहीं करेंगे। भगवान को सत्कर्म समर्पित किया जा सकता है। दुष्कर्म का फल तो दुख को भोगना पड़ेगा। राजा ने अगर कुछ इनाम दिया तो आप उसे लौटा सकते हैं, पर राजा ने यदि कुछ सजा दी है तो आप उसे वापस नहीं कर सकते यह तो आपको ही भुगतनी पड़ेगी। भगवान ने सुखिया पर कृपा की निष्काम कर्म का फल है भक्ति। सुखिया धन्य हुई। 

भक्ति का धन आया जिसके जीवन में वही हकीकत में सुखी है, धनवान है। भगवान अपने धाम को छोड़कर ऐसे भक्त के पास आते हैं। क्योंकि भगवान भी भक्तिसूत्र में बंधे हैं। भगवान भक्ताधीन है, जगत भगवान पर आधीन है। सुखिया पर भगवान ने अनुग्रह किया। 

बाबा नंद और ग्वाल बाल सभी बैल गाड़ी में घर का सामान रख रहे हैं। सब गोपियाँ भी अपने अपने बच्चों को लेकर बैलगाड़ी में बैठीं और गायों के वृंद को लेकर सब ग्वाल गोकुल को छोड़ कर चले। गोकुल से वृन्दावन की दूरी 26 km है। आये वृन्दावन, वहां बसाई बस्ती। वृन्दा याने तुलसी, और वन इसलिए इसका नाम वृंदावन। अब वृन्दावन की शोभा देखने चले श्रीकृष्ण और दाऊ अपने मित्रों के साथ, वृंदावन की शोभा देखते ही भगवान अति प्रसन्न हो गए। गोविंद को तुलसी अति प्रिय है, फिर यह तो तुलसी का वन है। 
कन्हैया, दाऊ दादा से बोले- दादा यहां घूमने का मन कर रहा है। चलो ऐसा करते हैं दादा गाय चराएँ, तो माँ और बाबा इस तरह से घूमने तो नहीं जाने देंगे। कहेंगे जंगल है बच्चों को नहीं जाना चाहिए। लेकिन यदि हम गाय चराएँ तो हमें घूमने को मिलेगा। तो आए श्रीकृष्ण और दाऊ बाबा नंद के पास और बोले बाबा हम तो ग्वाल है न, हम तो अब बड़े हो गए हैं। हम भी गाय चराएंगे। माता जसोदा ने कहा- बेटा! तुम अभी बहुत छोटे हो तुम गायों को सम्हाल नहीं पाओगे। पर जब बहुत जिद की तो कहा- अच्छा ठीक! अभी बछड़ों को लेकर तुम जाओ, बछड़े चराओ। बछड़े भी छोटे हैं, तुम भी छोटे हो! तुम गायों को सम्हाल नहीं पाओगे। पर जब बहुत हट की तो कहा, अच्छा ठीक अभी बछड़े को लेकर तुम जाओ, बछड़े चराओ। बछड़े भी छोटे हैं तुम भी छोटे हो। कन्हैया ने कहा- दाऊ बछड़े तो बछड़े हैं चलो घूमने को तो मिलेगा। कन्हैया अब बछड़े चराने लगे।

सोमवार, 16 दिसंबर 2024

यमलार्जुन की स्तुति(भाग 2) 98

वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां, हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोर्नः।
स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत्प्रणामे, दृष्टिः सतां दर्शनेsस्तु भवत्तनूनाम्।।

हे नाथ! हमारी वाणी आपके गुण कथन में लगी रहे। कान सदा आपके कथा श्रवण में लगे रहे। हे दामोदर! नेत्र सदा दर्शन करें। हमारे हाथ सदा आपके पूजा में लगे रहे। हमारे पैर तीर्थ यात्रा करें और मस्तक सदा आपको नमस्कार करें। हमारी सब इन्द्रियां आपकी सेवा में लगी रहे। हे भगवान! जब इन्द्रियां आप को छोड़कर अन्यत्र जाती है तब ही पाप की संभावना बढ़ती है। इस प्रकार भगवान से भक्ति की मांग की याचना, भगवान से लौकिक सुख माँगना! मूर्खता है। 

बादशाह किसी किसान पर खुश हो! मांग तुझे क्या चाहिए। तो वह बादशाह से धन छोड़ कर एक बैलगाड़ी भूसा मांगे, तो यह उसकी मूर्खता नहीं है क्या?.. इसी प्रकार भगवान से लौकिक सुख मांगना भूसा मांगने जैसी मूर्खता है। एक भक्त मंगलवार का व्रत करता था रोज़ हनुमानजी के मंदिर जाता और कहता है। हनुमान जी! मुझ पर कृपा करो… मुझे सिर्फ एक लाख रुपए चाहिए। सिर्फ एक लाख रुपए दीजिये। अब हनुमान जी तो हनुमान जी हैं, हर सिद्धि उनके पास हैं। माता जानकी जी ने वरदान दिया। 
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता। 
अस वर दीन्ह जानकी माता।। 

मैं हर शनिवार को एक पांव तेल चढ़ाऊंगा, मंगलवार को चोला चढ़ाऊंगा। एक माह तक प्रार्थना करता रहा तो हनुमान जी को बड़ा गुस्सा आया। मूर्ख मेरे पास एक लाख होता तो तू एक पांव तेल चढ़ाएं, इससे अच्छा तो यह होता न कि मैं खुद तेल का तालाब बनाकर उनमें तैरता रहता। 

भगवान से लोकिक सुख मांगना तो तुच्छता है, मूर्खता है। नलकूबर और मणिग्रीव ने नन्द नंदन की स्तुति की शाप मुक्त हो दोनों अपने धाम चले गए। दोनों वृक्ष जब जमीन पर गिरे तो आवाज सुनकर नन्दादि सब ग्वाल दौड़कर आए। श्रीकृष्ण को बंधा था ऊखल, नंदबाबा ने छोड़ा। सोचा ये वृक्ष गिरे कैसे?.. अगर ये वृक्ष कन्हैया पर गिरते तो क्या होता। यहाँ तो बहुत अनिष्ट हो रहा है, कंस के सेवकों ने बहुत उपद्रव मचाया है। अब तो यह स्थान छोड़कर कहीं जाना पड़ेगा, गोकुल छोड़ने का निर्णय लिया गया। तभी उप नंदा ने बताया बाबा! यहाँ से थोड़े दूर वृन्दावन है, वह बड़ा दिव्य वन है। वहाँ हमारी गायों को घास भी मिलेगी, पास में ही गोवर्धन है यमुना है। पूर्ण निर्णय होगया कि अब गोकुल को छोड़कर वृंदावन में बसेंगे। 

तब सुखिया आई है, फल बेचने उसको नन्द नंदन के दर्शन करने की बड़ी इच्छा थी। इसका नाम सुखिया है, पर इस संसार में सुखिया हैं कौन?.. सब दुखिया है। बोले- जो कर्म तो करते हैं, साथ कर्म के पौधे को पुरुषार्थ का जल पिलाए फिर कर्म के पौधे पर जो फल लगे, उसे भगवान को समर्पित कर दें। यानी ऐसा निष्काम कर्म करने वाला साधक ही सुखिया है, बाकी दुखिया है। कर्म करो कर्म के पौधे लगाओ और पुरुषार्थ का पानी भी पिलाओ पर जब फल आए, तो फल भगवान को समर्पित करो।

रविवार, 17 नवंबर 2024

यमलार्जुन उद्धार भाग - 1 (97)

एक बार मां यशोदा को विचार आया मेरे घर में इतना सारा माखन है फिर भी कन्हैया मेरे घर का माखन नहीं खाता है। पूरे गोकुल में चोरी करता फिरता है, भला घर में क्यों नहीं खाता होगा?..

मां ने विचार किया तब मां को लगा, गोपियां स्वयं माखन उतारती हैं, स्वयं दधि मंथन करती हैं और मेरे घर तो दास दासियां दधि मंथन करती हैं। भगवान की सेवा दूसरों से करानी नहीं चाहिए, स्वयं ही करनी चाहिए। मैं खिलाती हूं तो खाता नहीं और गोपियों से छीनकर-लूटकर खाता है। आज से लाला के लिए मैं स्वयं दधि मंथन करूंगी और अपने लाला को अपने हाथों से खिलाऊंगी। आज मइया ने स्वयं दधि मंथन प्रारंभ किया। दधि मंथन करती हुई माँ का शब्द चित्र श्री शुकाचार्य जी ने यहां बताया।

क्षौमं बासः प्रथुकटीतटे, विभृती सूत्रनध्दं पुत्रस्नेहस्नुतकुचयुगं, जात कम्पं च सुभ्रूः। रज्ज्वाकर्षश्रमभुजचलत्, कड़्कणौ कुण्डले च, स्विन्नं बक्त्रं कवरबिगलन् मालती निर्ममन्थ।। ३//१०

बैठी है माँ छोटी सी खटिया पर दधि मंथन कर रही है और हाथों में जो कंगन पहने हुए हैं, उसका मधुर स्वर आ रहा है। माँ का पूरा शरीर हिल रहा है। जरा ध्यान दें! मां ने कानों में कुंडल पहने हुए हैं जो हिल रहे हैं, मां ने अपने बालों में जो फूल लगाएं हैं। वह नीचे गिर रहे हैं, मां को कृष्ण के प्रति वात्सल्य के कारण दूध अपने आप बह रहा है। यह ज्ञाननिष्ठ, कर्मनिष्ठ और भक्तिनिष्ठ की क्रियाओं का दर्शन है। इसका संतों ने अर्थ निकाला है।

हाथ के कंगन कर्मनिष्ठ की क्रिया है, कानों के कुंडल ज्ञाननिष्ठ की क्रिया बताती है और स्नेह के कारण दूध का अपने आप बहना भक्ति को बताती है। देखो मइया दधि मंथन कर रही है यह कर्म हुआ और किसके लिए है?. कृष्ण के लिए! तो कृष्ण मन में समाया है। कि मैं माखन निकालूंगी अपने कन्हैया को खिलाऊंगी यह भक्ति को बताता है और यदि ज्ञान नहीं तो कर्म में कुशलता नहीं हो सकती और जब तक कुसलता नहीं आएगी, तब तक हम योगी कैसे बन सकते हैं। भगवान योग की परिभाषा देते हुए कहते हैं। योग: कर्म सुकौसलम् अपने कर्म में माहिर बने कुसल बने यह भी योग है।


ब्राह्मण को अपने कर्म में कुशल होना चाहिए, क्षत्रिय को अपने कर्म में माहिर होना चाहिए वैश्य बनिया को अपने कर्म में निपुण होना चाहिये और शूद्र को अपने कर्म में संतोष होना चाहिये। तो अपने कर्म में कुशलता प्राप्त करना ही योग है और यह बिना ज्ञान के नहीं आएगा। आपका जो कर्म है, उसका पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिए।

 

एक स्त्री को भोजन पकाने का ज्ञान होना चाहिए, तब वह कुशलता से भोजन पकाएगी यह कर्म है। अपने पति के प्रेम को मन में रखते हुए, की आज मैं खीर बनाऊंगी अपने पति परमेश्वर के खिलाऊंगी, वे खायेंगे और मेरे पर प्रसन्न होंगे। यह एक स्त्री की भक्ति है जब ज्ञान भक्ति और कर्म का समन्वय होता है तब अच्छी रसोई बनती है। पत्नी पकाये पति के लिए, बहन पकाये भाई के लिए, पुत्री पकाये पिता के लिए और मां पकाये पुत्र के लिए। यह एक ही स्त्री के चार रूप होते हैं और इन चारों रूपों में भक्ति है। माँ दधि मंथन कर रही थी और कृष्ण के बाल चरित्रों का गान कर रही थी, याद कर रही थी माँ कृष्ण के बाल चरित्रों को। उस वक्त भगवान माँ के इस प्रेम को देखकर प्रसन्न होकर वहाँ आए। इस समय कृष्ण भूखे हैं, आए और दही मथनी को पकड़ लिया।

 

मानो भगवान कहना चाहते हैं कि माँ बड़े-बड़े ज्ञानी, बड़े-बड़े विद्वान शास्त्रज्ञ लोग पुराणों, उपनिषदों का मंथन करते हैं और उस मंथन से प्राप्त तत्व मैं हूँ। तुम क्यों मंथन कर रही हो?.. मैं तो तुम्हें सहज ही प्राप्त हूँ। छोड़ो इस मंथन को और मुझे दूध पिलाओ। मैं तो तुम्हारे प्रेम का भूखा हूँ। माँ ने तुरंत दधि मंथन कर दिया बंद, लाला को उठाया गोद में और दूध पिलाने लगी।

 

श्री कृष्ण ने पूछा- मैया! एक बात पूछूं! माँ ने कहा- हाँ बेटा पूछ! काह बात है। कन्हैया ने कहा- माँ! तुम्हें दूध प्यारा है कि पूत प्यारा है। माँ ने कहा- हाँ बेटा! मुझे पूत प्यारा है। क्यों?.. कन्हैया ने कहा- बस यूं ही माँ। ठीक उसी समय चूल्हे में रखा दूध पक रहा था तो वह उबलकर नीचे गिरने लगा, माँ का ध्यान वहाँ गया तो कन्हैया को बैठाया नीचे और पहुंची दूध को बचाने।

 

यह देखकर कन्हैया को आ गया गुस्सा! कि अभी तो माँ ने कहा, कि मुझे पूत प्यारा है। पर अपने पूत को छोड़कर दूध को बचाने दौड़ पड़ी। कन्हैया ने उठाया एक पत्थर और दे मारा मटकी पर, मटकी फूटी सारा छाछ घर में बिखर गया। यहाँ माँ ने जैसे ही दूध उतारा चूल्हे से, तो धमाका सुनाई पड़ा, क्या हुआ? देखने दौड़ी माँ, देखा! तो माखन की भरी मटकी फूटी पड़ी है। छाछ फैला है पूरे घर में, यह देखा तो माँ को भी बड़ा गुस्सा आया। उठाया हाथ में लकड़ी बहुत शरारती हो गया, आज तो इसको दंड दे के रहूंगी, छोड़ूंगी  नहीं।

 

दौड़ते-दौड़ते मइया थक गई, तो कन्हैया को दया आ गई। माँ ने कहा- कन्हैया! रुक जा। कन्हैया ने कहा- मैया तुम मारोगी। यह सुनकर मइया ने अपने हाथ की लकड़ी को फेंक दिया। आजा मैं नहीं मारूंगी! तब कन्हैया धीरे-धीरे माँ के पास आए और माँ ने पकड़ लिया। चल आज मैं तेरी आरती उतारती हूँ। तू इतना भी सबर नहीं कर सकता, इतना भी नहीं रुक सकता कि मैं दूध उतार सकूँ। ऐसी कौन सी भूख लगी है तुझे?.. कितना नुकसान कर दिया! मेरी सास की दी मटकी तू ने फोड़ दी। आज तेरा भोजन बंद! यह है मातृ प्रेम; भोजन खिलाती ही नहीं! भूखा भी रखती है दंड देने के लिए। सच में भोजन नहीं देती और न स्वयं लेती! चल आज तुझे ऊखल के साथ बांधती हूँ। कन्हैया रोते रहे, मां ने एक न सुनी। माँ रस्सी लेकर आईं, बाँधने लगी! तो दो अंगुल छोटी पड़ गई और दूसरी रस्सी लाई फिर छोटी पड़ी। ये कौन सी रस्सी है?.. यह दाम है! ब्रज में दाम उसे कहते हैं जिस रस्सी से गाय को दुहते समय उसके पिछले पैरों में जो बांधा जाता है। ऐसी कई रस्सियों अर्थात दाम को जोड़ा, लेकिन कृष्ण नहीं बंधे। मतलब जो ये दाम है, ये सब भगवत प्राप्ति के साधन है योग, यज्ञ, दान, जप, पूजन! लेकिन जब अहंता और ममता का त्याग नहीं होगा, तो भगवान बंधन में आएंगे कैसे?.. कितनी भी कोशिश क्यों ना करो, कितना भी तप, जप, ध्यान, योग क्यों ना करलो। जब तक अहंता और ममता को नहीं छोड़ोगे तब तक परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती। प्रभु को पाने के लिए स्वसमर्पण और सर्व समर्पण करना होता है। स्वसमर्पण से ममता और सर्वसमर्पण से अहंता का नाश होता है।

 

स्वसमर्पण ही आत्मनिवेदन है, जो नवधा भक्ति का अंतिम सूत्र है। जब मां ने स्वसमर्पण किया, फिर सर्वसमर्पण कर दिया, तो भगवान बंधन में आ गए और नाम पड़ा दामोदर। फिर माँ लग गई अपने काम में, रोते रहे नंदलाल! माँ ने आज एक बात भी नहीं सुनी रोते-रोते थक गए कन्हैया। फिर सोचा अब किसको सुनाए?. माँ तो हमारा सुन ही नहीं रही। रोना तब चाहिए, जब मनाने वाला कोई हो।

 

रोते हुए भगवान का ध्यान गया यमलार्जुन के वृक्ष पर, भगवान ने सोचा! हम तो बंधनावस्था में हैं, पर इनको मुक्त कर देते हैं। भगवान आगे चले पीछे-पीछे ऊखल घसिटता हुआ चला आया। घसीटते हुए ऊखल को ले गए, दो यमलार्जुन वृक्ष के मध्य में बहुत कम जगह थी। कन्हैया तो निकल गए पर ऊखल फंस गया और फिर कन्हैया ने ऐसा ज़ोर लगाया कि दोनों वृक्ष मूल से उखड़कर धरती पर गिरे धड़ाम। उसमें से दो पुरुष प्रकट हुए, नलकूबर और मणिग्रीव। भगवान है बंधन में, तब काम किया शापित को मुक्त करने का। यह करुणा है परमात्मा की, स्वयं बंधन में है, तब भी भक्त को मुक्त करते हैं। ये नलकूबर और मणिग्रीव कुबेर के दो पुत्र हैं। भगवान रुद्र के अनुचर है, मदिरा पीकर कैलाश के रमणीक उपवन में जल क्रीड़ा कर रहे थे स्त्रियों के साथ उस समय वहाँ से देवर्षि नारदजी निकले नारद जी को देखकर स्त्रियों ने तो वस्त्र पहन लिए, लेकिन नलकूबर और मणिग्रीव ने वस्त्र धारण नहीं किया। तो नारदजी ने शाप दे दिया मेरे सामने तुम ऐसे खड़े हो जैसे वृक्ष खड़ा होता है। वस्त्र नहीं पहन सकते तो जाओ तुम दोनों वृक्ष हो जाओ।

 

महाराज संत का क्रोध भी अनुग्रह होता है, संत का अपराध बना नलकूबर और मणिग्रीव का, उसके चार कारण बताते हैं। पहला संपत्ति का अभिमान, बाप कुबेर है। दूसरा सत्ता का अभिमान, रुद्र के अनुचर है पोस्ट अच्छी है। तीसरा व्यसन जहाँ सम्पत्ति और सत्ता का अभिमान होता है वहाँ व्यसन भी होता है और चौथा व्याभिचार! तो संपत्ति, सत्ता, व्यसन और व्याभिचार ये चार कारण थे संतों का अपमान भी करने लगे थे। पर संत का क्रोध भी अनुग्रह होता है। जब दोनों ने क्षमा मांगी तब नारद जी ने कहा- कि द्वापर के अंत में भगवान श्रीकृष्ण यदुवंश में प्रकट होंगे तब तुम्हारा मोक्ष होगा। देखो जिस कारण भगवान का दर्शन हुआ, उसे शाप या वरदान। यह क्रोध है की अनुग्रह। आज भगवान के द्वारा नल कूबर और मणिग्रीव का उद्धार हुआ दोनों को आज मुक्ति मिली तब भगवान की स्तुति की-

बुधवार, 30 अक्टूबर 2024

कान्हा की मिट्टी लीला 96

लेकिन एक दिन कन्हैया पकड़े गए इस दिन कन्हैया अकेले हैं अचानक बैठे बैठे मिट्टी उठाई और खाली ओर बल्लू दादा ने देख लिया बोले क्यों कन्हैया मिट्टी खा रहे हो छोड़ो बरना जाकर मैया से कहता हूँ पर कन्हैया ने मिट्टी नहीं छोड़ी और यहाँ बल्लू दादा आये और माँ से सिकायत करदी ओमिया कन्हैया मिट्टी का रहा है।

आई मैया कन्हैया के पास क्यों रे तुझे माखन कम पड़ गया जो अब मिट्टी खा रहा है। तब कन्हैया बोले-

नाहं भक्षितवानम्ब सर्वे मिथ्याभिशंसिन:।

यदि सत्यगिरस्तर्हि समक्षं पश्य ये मुखम्।। ३५//१०

मां! हे अम्ब!.. मैं ने नहीं खाई, सब झूठे हैं। यदि तुम इनकी बात सच मानती हो तो मेरा मुख तुम्हारे सामने ही है, तुम अपनी आंखों से ही देख लो अब यशोदा जी ने कहा- बताओ अपना मुख और जब कन्हैया ने अपना मुख खोला तो माँ यशोदा ने देखा।

सा तत्र ददृशे विश्वं जगत स्थास्नु च खं दिश: ।

साद्रि द्वीपाब्धि भूगोलं सवाश्वग्नीन्दुतारकम्।।३७//१०

मां ने पूरा विश्व देखा भगवान के मुख में, पुनः कन्हैया ने जब यह बताया कि माँ मैंने नहीं खाई। तो क्या भगवान झूठे हैं?

भगवान तो सत्यव्रत हैं, परमसत्य ही कृष्ण हैं। तो क्या भगवान ही असत्य बोले, कि  मैंने नहीं खाई। अगर भगवान ही असत्य बोलने लगे तो जीव क्या करेगा। जरा संस्कृत में शब्द को समझें कि कन्हैया ने क्या कहा- अहं “भक्षितवानम्ब” अहं कर्ता, अम्ब सम्बोधन, भक्षितवान क्रिया पद और वाक्य नकारात्मक। अब क्या नहीं खाया ये उन्होंने नहीं बताया। मतलब कन्हैया कहना चाहते हैं, मां! हम भोक्ता नहीं, हमने कुछ खाया नहीं। इस पद में क्रिया है, कर्ता है, पर कर्म नहीं है। क्या नहीं खाई यह नहीं बताया।

कोई बोले- क्या नहीं खाई? तो बताते मिट्टी नहीं खाई! तब यह कर्म होता, मिट्टी माने कर्म। क्रिया प्रकृति है, स्वभावगत है। क्रिया करनी नहीं पड़ती, क्रिया हो जाती है। यह क्रिया वाचक नहीं, कर्म वाचक है। जैसे- आंखों की पलकों का गिरना क्रिया है और किसी चीज को देखना कर्म वाचक है।

पलकों का गिरना, धड़कन का धड़कना, भूख लगना ये सब क्रिया है यह अपने आप होता है, इसमें हमारा कोई बस नहीं। क्रिया में न पुण्य होता और न पाप होता। कर्म के साथ पाप पुण्य जुड़ते हैं, क्रिया के साथ नहीं। तो भगवान की यह सहज क्रिया है, एक लीला है, इसमें कर्म है ही नहीं।

शेर प्राणी को मार कर खा जाता है, यह उसका सहज स्वभाव या प्राकृतिक क्रिया है। ऐसा करने पर शेर को कोई पाप य पुण्य नहीं होता क्योंकि शेर को पाप पुण्य का कोई ज्ञान नहीं। पर मानव को ज्ञान है पाप पुण्य का। बेचारे शेर को खेती करना रोटी पकाना तो आता नहीं। मानव को आता है फिर भी मानव जीव खाता है। इसलिए मानव को पाप लगेगा।

भगवान कर्म के बंधन में नहीं आते क्योंकि वे लीला करते हैं। एक तो उन्हें अभिमान नहीं, दूसरा कर्म के फल की कोई इच्छा भी नहीं है। इसलिए भगवान बंधन मुक्त हैं। भगवान की जो भी क्रिया हो रही है वह मात्र एक लीला । यहां पर भगवान ने कह दिया मां मैं भोक्ता नहीं, मिट्टी उठाई मुख में रखी पर मैंने भक्षण नहीं किया।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं

न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञ:।

अहं भोजनं नैव भक्ष्यं न भोक्ता

चिदा नंद रूप: शिवोहम् शिवोहम्।।

इस प्रकार भगवान ने अपने मुख में समूचे विश्व का दर्शन कराया। ऐसा विराट रूप देखा मां ने, जो कुछ है सब भगवान में ही है। सब लोग भगवान में हैं भगवान से अलग कुछ भी नहीं है। इस बात का ज्ञान जब मां को हुआ कि सारी धरती ही भगवान के अंदर है तो फिर खा क्या सकते हैं। मुझसे अलग कुछ है ही नहीं तो मैं खा क्या सकता हूँ। खाई तो वह जाती है जो स्वयं से अलग होमां को बताया! मां सर्वत्र और सर्वदा मैं ही हूं। 


माँ ने जब भगवान के इस विराट रूप को देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ, कि मैं अपने बच्चे के मुख में ये क्या देख रही हूं। यह स्वप्न है या माया, क्या यह मेरे बच्चे का स्वाभाविक ऐश्वर्य है?.. फिर माँ ने निर्णय लिया, नहीं-नहीं यह स्वप्न नहीं! मैं तो जागृत हूं और यह  देवमाया भी नहीं है।

 

अब यह देवमाया नहीं, स्वप्न नहीं तो फिर क्या है? मेरे बच्चे का स्वाभाविक ऐश्वर्य है। तो आज माँ को ज्ञान हो गया कि जिनको मैं पुत्र मान रही हूँ, वह सच में परमात्मा ही है। भगवान ही आए हैं मेरे घर पुत्र बनकर, कहते हैं! जिसके पास धन होता है उसे धनवान कहते हैं। उसी तरह जिसके पास भग होता है, उसे भगवान कहते हैं। छः प्रकार के भग हैं- ऐश्वर्य, वीर, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य इसे कहते हैं “षडभग”। ये छः भग से जो युक्त है वह भगवान हैं, ब्रह्म है, निराकार हैं, साकार है। और ईश्वर जब अवतरित होता है तब भगवान कहलाता है। ब्रह्म, ईश्वर और भगवान इन तीनों शब्दों में इतना अंतर है। षडेश्वर्य  संपन्न होकर जब आते हैं तो भगवान कहलाते हैं। मां ने समझ लिया यह मेरे बच्चे का स्वाभाविक ऐश्वर्य है। भगवान ही मेरे यहाँ पुत्र बनकर आये हैं।

 

माँ ने यहां पर भगवान के चरणों में वंदना किया, यह देख कन्हैया को अच्छा नहीं लगा। ऐसे में तो सारी लीला ही समाप्त हो जाएगी। मैं इनका पुत्र बनाकर आया हूँ, अब यह मुझे अपने गोद में नहीं बैठायेगी। हमारी पूजा होने लगेगी, हमारी आरती, स्तुति होने लगेगी। मैं तो यहां लीला करने आया हूँ यह क्या हो गया। तब भगवान ने अपनी माया का प्रयोग किया माँ पर।

 

महाराज इन्होंने अपनी मां को भी नहीं छोड़ा, मां पर भी माया का प्रयोग किया और यह कोई साधारण माया नहीं है, यह वैष्णवी माया है। भगवान अपने भगतों पर वैष्णवी माया का प्रयोग किया करते हैं। भगवान के प्रति जो अशक्ति है, वही वैष्णवी माया है और संसार के प्रति जो मोह है वह योगमाया है। हमारी आसक्ति संसार को छोड़कर यदि भगवान में लग जाये तो जीवन धन्य हो जाये। यह जो मोह है, इसे भक्ति कहते हैं। गोपियों का श्रीकृष्ण के प्रति जो मोह है वह भक्ति है।

 

इस प्रकार जब वैष्णवी माया का प्रयोग किया तो माता का श्रीकृष्ण के प्रति ईश्वरीय भाव पुत्र में परिवर्तित हो गया और जो देखा वह सब भूल गई। झट से अपने लल्ला को गोद में उठा लिया और पहले की भांति लाड़ लड़ाने लगीं।

 

यहां पर परीक्षित ने श्री शुकाचार्य जी से पूछा- महाराज! श्रीकृष्ण के जन्मदाता माता पिता तो वसुदेव देवकी हैं, इनको जो सौभाग्य नहीं मिला वह सौभाग्य नंद यशोदा को मिला। नंद यशोदा ने ऐसा कौन सा पुण्य किया था?.

 

तब शुकदेव जी बोले- परीक्षित पूर्व जन्म में ये दोनों द्रोण नाम के वसु और उनकी धरा नाम की पत्नी थी। ब्रह्मा जी के कहने से इन्होंने गायों की बहुत सेवा की, तब भगवान ने वरदान दिया कि मैं तुम्हारे घर गोपाल बनकर आऊंगा। भले ही मेरे माता पिता कोई अन्य हों, पर मां हम तुम्हारा ही दुग्ध पान कर बड़े होंगे। तुम्हारी अंगूरी पकड़कर चलना सीखेंगे। इसलिए द्रोण नाम के वसु और उनकी पत्नी धरा, आज नंद यशोदा बनकर आये हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज रज अपने मुख में रख दी, और ब्रजरज की महिमा बढ़ गई। ब्रज में तो रज की ही महिमा है। ब्रह्म बेटा बनकर आया है माँ यशोदा का, खुले चरण भगवान ने विचरण किया है वृंदावन में इसलिए भी ब्रजरज की महिमा बड़ी है।

रविवार, 20 अक्टूबर 2024

प्रभावती और नटखट कान्हा की टोली भाग 3 (95)

और तभी प्रभावती घूँघट निकाले द्वार पर आई, पीछे ग्वालों की टोली है। माँ… ओ मइया जशोदा! निकलो बाहर, तुम मानती नहीं न! कहती हो रंगे हाथ पकड़ के लाओ। आज मेरे घर में चोरी करता पकड़ा गया है। इसके मुख में माखन लगा है, इसके कपड़ों में माखन लगा है। आज यदि इसकी मेरे सामने पिटाई न हुई तो मैं यहीं बैठी रहूंगी, जाऊंगी नहीं। जब तक इसकी पिटाई होगी। 

कन्हैया ने कहा- देखा मइया…! अपने देवर को पकड़ कर लाई है और कहती है पिटाई की बात। अब मइया यशोदा यह देख कर प्रसन्न हो हंस पड़ी। ये पागल तो नहीं हो गई..। अपने देवर को लेकर पिटाई कराने आई है। 

अब यह सुनकर प्रभावती को बड़ा आश्चर्य हुआ???.. मइया हंस रही हो… अब तो इसे पीटो, यह रंगे हाथ पकड़ा गया है आज। तब यशोदा मइया बोलीं- प्रभावती देख यहां बाबा नन्द नहीं बैठे अब तू अपना घूँघट उठा और देख। प्रभावती ने घूँघट उठाया और सामने देखा तो मइया के पास कन्हैया खड़े। प्रभावती ने सोचा ये यहां कैसे?..

और मैंने हाथ किसका पकड़ रखा है?.. जैसे देखा!.. तो उसका देवर… मुए तू यहाँ कैसे आया। भाभी मैं क्या जानूं तुमने ही तो पकड़ कर लाया। अब प्रभावती समझी, कि वो जो हाथ बदलने वाली बात थी न, उसी में कुछ चाल चली है। मां यशोदा ने कहा- प्रभावती क्यों मेरे बच्चे के पीछे पड़ गई है। क्या मिलता है तुम्हें?.. आओ तुम्हारा मेरे घर बैठो, चाय नाश्ता करो। मेरे बच्चे के पीछे क्यों पड़ी हो,.. जाओ घर जाओ। अब प्रभावती को काटो तो खून नहीं, ऐसी बुरी दशा हुई। इस प्रकार से कन्हैया की माखन लीला चल रही है।

शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

प्रभावती और नटखट कान्हा की टोली भाग- 2 (94)

अब दूसरे दिन ग्वालों ने पूछा लाला आज कहाँ जानो है?.. तो एक बोला- कन्हैया वही चलते हैं प्रभावती के घर, वहाँ बड़ा मजा आता है, कल बड़ा आनंद आया, वहीं जाते हैं। जो चिढ़ता है ना, बच्चे उसे ही ज्यादा चिढ़ाते हैं। कन्हैया ने कहा- तो फिर चलो; वही चलते हैं। 


यहाँ प्रभावती को भी भरोसा था कि आज फिर वह आएगा। तो बढ़िया ताजा-ताजा माखन निकाली और मटके में भरी फिर ऊपर छींके ऊपर टांग दिया और द्वार बंद करके स्वयं अंदर छिप गईं। आई टोली देखा कि दरवाजा बंद है, तो सोचा जमुना जल भरने गयी होगी, कल की तरह। कन्हैया ने कहा- दो खड़े रहो बरामदे में जब आए तो आवाज देना। दरवाज़ा खोला धक्का मार मारकर अब इस टोली में प्रभावती का देवर भी था। बुलाया कन्हैया ने; छोटा सा था देवर, पूछा- कहाँ रखा है माखन?. बताया इस कमरे में छींके में, सुनते ही बड़ी क्रोधित हुई प्रभावती अपने देवर पर। तुझे भी देख लूंगी; तू ही सब समाचार पहुंचाता है। प्रभावती ने सोचा इतना ऊपर है ये कैसे निकालेंगे?.. लेकिन उनके पास भी तरीका था पहले पांच फिर तीन फिर दो और उसके सबसे ऊपर कन्हैया। जैसे कन्हैया ने मटका पकड़ा मित्रों ने पूछा लाला पकड़ लियो। बोले- हाँ भैया! पकड़ लियो। ठीक उसी समय प्रभावती प्रगट हो गई। अभी ठहरो, देखती हूँ सबको; अरे भागो-भागो यहाँ तो प्रभावती है। गिरे सब नीचे गिरते पड़ते भागने लगे सब और कन्हैया लटके रह गए। 

प्रभावती ने कहा- वाह! बहुत सुन्दर लाला; तेरी मइया मानती नहीं ना, ऐसे लटके रहियो। अभी बुलाकर लाती हूँ तेरी माँ को और बताती हूँ की ये है तुम्हारे लाला का पराक्रम; तब तो पिटाई होगी तुम्हारी। 

कन्हैया ने कहा- ओए प्रभावती देख, मेरी बात सुन; तू घर पर जावेगी, माँ को बुलावेगी तब तक तो बहुत देर हो जाएगी और मैं लटका रह नहीं सकता। ऐसा कर ना मुझे ही ले कर चल मेरी माँ के पास, तुझे पिटाई ही करवानी है तो ऐसे करवा। तब तक तो मेरा हाथ दुखने लगेगा। 

प्रभावती ने कहा- आए ना ठिकाने पर; कहा- लाला को, अच्छा आ जाओ! अब कन्हैया नीचे आए, मुख साफ करने लगे तो प्रभावती ने कहा- खबरदार! साफ मत करना। रंगे हाथों पकड़ के ले जाना है यशोदा मइया के पास, अब अपनी दाएं हाथ से कृष्ण का बायां हाथ पकड़ा और घूंघट निकला, क्योंकि गली में बड़े बुजुर्ग बैठे रहते है। यह मर्यादा है, ले जाने लगी हाथ पकड़ के और कन्हैया की टोली भी पीछे-पीछे चली, बाहर खड़े इंतजार कर रहे थे ना! कब निकालेगा कन्हैया?.. देखा तो उनके पीछे-पीछे चल पड़े। आगे कन्हैया को पकड़ के प्रभावती पीछे-पीछे ग्वालों की टोली, मित्र बड़े चिंतित हो गए, आज हमारा सरदार पकड़ा गया। आज इसकी पिटाई होगी, क्या करें?.. घर नजदीक ही है, लाला ने भी सोचा यदि इस स्थिति में माँ के हाथ में देती है मुझे, तो मइया नहीं छोड़ने वाली, पिटाई अवश्य होगी। कुछ तो करना पड़ेगा! 


कन्हैया ने पीछे देखा तो प्रभावती का देवर भी आ रहा था, उसे इशारा किया नजदीक आओ और प्रभावती घूंघट निकाले हुए जा रही थी, माँ के पास और कहती जाती है। चल आज तेरी पिटाई करवाती हूँ। कन्हैया ने कहा- ठीक है पर तुमने मेरी कलाई कितनी कसके पकड़ी है,  हाथ लाल हो गए। देखो; बायां हाथ छोड़ो, दायां हाथ पकड़ो, ये हाथ मेरा दुखने लगा। 

प्रभावती ने कहा- यहाँ तो तुम्हारा हाथ लाल हुआ है! घर पहुंचो माँ ऐसी थप्पड़ लगाएगी के तुम्हारा गाल लाल हो जाएगा। आज तो पिटाई करवाऊंगी, पिटवाकर ही छोडूंगी मेरा नाम प्रभावती है। लाओ अपना हाथ। कन्हैया ने हाथ छोड़ा और दूसरा हाथ दिया प्रभावती के हाथ में, लेकिन अपना नहीं; उसके देवर का! ले.. जा; तेरा तुझको समर्पित। 

अब प्रभावती ने तो लंबा घूँघट निकाला हुआ है यह देख पीछे सब ग्वाल बाल हंसने लगे। वाह कन्हैया बढ़िया तरकीब निकाली। अब कन्हैया ने अपना मुख हाथ साफ किया और दौड़ते हुए गए जहां माँ यशोदा बैठीं थी आंगन में; उनकी गोद में जाकर बैठ गए और बोले- मैया! ओ प्यारी मैया! मैया ने कहा- काह बात है बेटा कन्हैया ने कहा बस यूं ही कन्हैया का बात है बताओ भैया ये गोपियां मुझे बहुत बदनाम करती है गोकुल में भला मैं क्यों चोरी करूँ हमारे पास तो इतनी सारी गाय है इतना सारा मक्खन है मैया साँची कहूँ ये सब गोपियां तुम्हारी ईर्ष्या करती हैं। माँ यशोदा बोलीं- ईर्ष्या वो क्यों करने लगी। कन्हैया ने कहा- तेरे जैसा लाला किसी को नहीं है ना, इसलिए! मैया बोली- चुप बदमाश अपने मुंह अपनी बड़ाई करता है। नहीं माँ!.. सच में, सब गोपियां ईर्ष्या करती है। इसलिए बार बार यहाँ शिकायत लेकर आती हैं। भला मैं क्यों चोरी करने लगा, झूठ मूठ मुझे बदनाम करती हैं। मैया- ने कहा- लाला! मैं जानती हूँ मेरा लाला बहुत सीधा है, बहुत अच्छा है। 

सच में बहुत बुरी आदत है इन गोपियन की जब देखो शिकायत लेकर मेरे घर चली आती है। इसलिए तो मैं उनकी एक नहीं सुनती। फिर कन्हैया ने रोने का बहाना बनाया और बोले- क्या नहीं सुनती माँ! बस यह मुझे बदनाम किए जा रही है। देखो अब तो मुझे लोग ही चोर कहने लगे, रोज़ मुझे चिढ़ाते हैं रोज़ कोई न कोई आ जाती है। देखना अभी कोई न कोई झूठी शिकायत लेकर आती ही होगी और मैं तो बैठा हूँ तुम्हारी गोद में और मुझे चोर कहेंगे। माँ जसोदा ने कहा- अच्छा तो आने दो उसे देख लूंगी मैं। लाला शांत! हाँ माँ… देखना।

सोमवार, 18 दिसंबर 2023

प्रभावती और नटखट कान्हा की टोली भाग-1 (93)

बड़ी नटखट लीलाएं हैं, नंदनंदन की, एक बार ऐसा हुआ कि कुछ गोपियां गई जमुना जी जल भरने, तो वहाँ चर्चा हो रही थी गोपियों में। ये यशोदा के लाला ने तो बहुत उपद्रव मचायो है सारे गोकुल में, वैसे है बड़ो सुंदर। 
एक गोपी बोली- बस लगता है उसे देखते ही रहें, इतनी मनमोहनी सूरत है। 
दूसरी ने कहा- लेकिन थोड़ा काला है। 
तीसरी बोली लेकिन मतवाला है। 
चौथी बोली- बड़ा नटखट है, एक बार ऐसा हुआ। मैं और ललिता सखी दोनों बात कर रही थीं, तो न जाने कब वो पीछे से आया और चोटी बांध कर चला गया दोनों की। फिर जैसे तैसे हम दोनों उठ खड़ी हुई और अलग हुए तो धड़ाम से गिरी नीचे, बहुत उपद्रव मचाता है। 

एक गोपी ने कहा- क्या बताऊँ! मेरी चोटी तो मेरे पति के दाड़ी से बांध दी थी उसने, सुबह-सुबह मैं उठी की पहली पहल नहा धो के तैयार हो जाएं अब उठकर जैसे चलने लगी तो पति देव भी पीछे-पीछे खींचे चले आए। 

एक गोपी ने कहा- मैं पानी भर के मटके में जा रही थी की रास्ते में मिल गया और पूछने लगा तुमने नहा लिया, मैंने कहा नहीं! बस तभी एक पत्थर उठा कर मेरी मटके में दे मारा, मेरा मटका भी फूटा और मैं भी भीग गई और फिर क्या कहता है मालूम?. कि पहले नहाया करो फिर घर का काम किया करो। सच बहुत नटखट है। 

पर एक गोपी थी जिसका नाम था प्रभावती उसने कहा- वो आता होगा तुम्हारे घर चोरी करने शरारत करता होगा तुम्हारे साथ! आवे मेरे घर, ऐसा सबक सिखाऊंगी कि सब भूल जावेगो, फिर आने का नाम ही ना लेगो। तो एक गोपी का लड़का अपनी माँ के साथ आया था जमुना जी में नहाने जब उसने सुनी यह प्रभावती की बात और वो कन्हैया का CID था, गुप्तचर दौड़ता हुआ गया यह समाचार कृष्ण को देने।

एक वृक्ष के नीचे टोली बैठी थी ठिठोली करती हुई और बीच में बैठा है नायक, पीली पीतांबर है मोर पंख का मुकुट है। आकर कहा- मित्र एक समाचार लाया हूँ! क्या?.. बोला- जमुना तट पर गया था नहाने अपनी माँ के साथ, तो प्रभावती ऐसा कह रही थी। कन्हैया ने कहा- ऐसी बात है! ठीक है तो आज उसी का घर एक बाकी रह गया था। चलो आज वही होगा भंडारा, वो हमें सबक सिखाएगी आज देखते हैं। 
अब प्रभावती तो गई थी जल भरने जमुना जी में, इधर मंडली प्रभावती के घर पहुंची और किवाड़ खोला घुसे सब घर में, मटका ऊपर छींके में था तो पांच नीचे फिर तीन ऊपर चढ़े, फिर दो उनके बाद कन्हैया चढ़े, मटका उतारा नीचे और सब माखन खाने लगे। 

जमके माखन खाया अब ये जहाँ जाते थे, बंदरों की टोली भी साथ-साथ पहुँच जाती थी। तो खुद खाएं बंदरों को भी खिलाएं जब सबका पेट भर गया फिर आधा मटका माखन अभी बचा था। कन्हैया ने कहा- खाओ-खाओ! ग्वालों ने कहा- बस कन्हैया! अब तो पेट भर गया। तो फिर ऐसा करो, ये प्रभावती बहुत आलसी है, देखें लीपा पोती ठीक से करती नहीं है। अब हमने इसका माखन खाया है, बदले में कुछ तो करें। लिया एक डंडा और मारी मटका में तो सारा माखन बिखर गया और माखन लीपने लगे पूरे घर में और भी जितने दही की हांडिया थीं, सब को फोड़ दिया और बाहर निकल के जैसी कुंडी लगी थी लगा दी और पास में ही एक वृक्ष में छिप गए, अब मज़ा आएगा। 

आई प्रभावती!... हाथी जैसी चाल ठुमक-ठुमक करती हुई, नूपुर बज रहे है उसके और जमुना जल से भरा है मटका, ग्वाल सभी देखते जा रहे हैं। अब सर पे तो मटकी है, नीचे देख नहीं सकती। कुंडी खोली धक्का देकर, किवाड़ खोला और ज्यों ही पग उठाया घर में जाने के लिए, ग्वालों के मुख में मुस्कान आई। पग रखा अंदर गई की पैर फिसला गिरी धड़ाम और फिसलते हुए सामने वाली दीवार पर जाकर टकराई, वह गिरी तो मटका भी गिर के फूट गया और माखन में मिल गया। तो दीवार का आधार लेकर जो ही खड़े होने का प्रयास किया, तो फिर से फिसल गई और पहुंची फिसलती दरवाजे तक द्वार से देखा तो छींके पर मटका नहीं। नीचे देखा तो माखन लिपा है माखन का मटका भी फूटा है। उसके पूरे शरीर में माखन लगा है। अब तो सर पकड़ के बैठ गयी, क्या करूँ??..

सब ग्वाल ऐसा हंसे, लाला आज तो बहुत आनंद आया, ये हम को सबक सिखाने वाली थी। अब तो प्रभावित बैठी-बैठी बाहर निकली। खड़ा होने का प्रयास ही नहीं किया। चल पड़ी कमर पे हाथ रख के मैया यशोदा के पास!.. ओह यशोदा मैया.. जानती हो?.. तुम्हारे लाला ने आज क्या किया?.. देखो! मेरा नाम प्रभावती है। छोडूंगी नहीं, ऐसा सबक सिखाऊंगी, याद रखेगा। 

मैया ने कहा- क्या हुआ?.. प्रभावती! आओ तो… शांति से बैठो! बताओ… क्या हुआ?.. बैठने नहीं आई मैं, मेरा नाम प्रभावती है। आज मेरे घर में उपद्रव मचाया है, संभालो अपने छोरा को, नहीं एक दो थप्पड़ लगाऊंगी। मेरा नाम प्रभावती है। 

मैया बोली- मैं जानती हूँ; तेरा नाम प्रभावती है, बार-बार बताने की आवश्यकता नहीं है। क्या किया है; मेरे लाला ने?. कहा- आकर देखो मेरे घर में, चोर कहीं का! अब तो यशोदा मैया को भी गुस्सा आया। बोली- क्या किया है? सुन; देख प्रभावती! मेरे लाला को चोर मत कहियो। चोर होगा तेरा पति। हकीकत में तुम सब गोपियों के बच्चों ने मिलकर मेरे लाला को बिगाड़ दिया। वह तो जानता ही नहीं कि चोरी कहते किसे हैं और आकर मेरे लाला को खरी खोटी सुनाती हो, उसे चोर कहती हो। देखो ऐसे ही चोर मत कहना, रंगे हाथों पकड़ के लाओ तो मैं सुनूंगी तुम्हारी शिकायत, अभी तुम जाओ यहाँ से। 
अब प्रभावती ने भी ठान लिया, मैया! अब इस बार कन्हैया को तुम्हारे हाथ में पकड़ा नहीं दिया; तो मेरा नाम प्रभावती नहीं। इतना कहकर वह अपने घर गई और कन्हैया बड़े प्रसन्न हुए। 

शनिवार, 16 दिसंबर 2023

माखन चोरी लीला 92

“अति प्रिय मधुर तोतरी बोली” 
अब भगवान श्रीकृष्ण बोलना सीख गए, उनकी बोली अति मधुर और तोतरी है। अब बहुत सारे इनके मित्र हुए, इन मित्रों के साथ में खेलते हैं कृष्ण और बलदाऊ। श्रीदामा, सुबल, मधुमंगल, मनसुख बहुत सारे मित्र हैं। तो मनसुख जो था वह दुबला पतला था। कन्हैया ने पूंछा! मित्र  तो तुम्हारा नाम क्या है? उसने बताया मनसुख। कन्हैया बोले- तुम मन सुख भी नहीं हो और तन सुख भी नहीं हो, कैसे दुबले पतले हो। 

देखो मनसुख मुझे अच्छा नहीं लगता कि मेरा कोई मित्र पतला दुबला हो, तुम माखन खाकर तगड़े क्यों नहीं होते। देखो मैं कैसो तगड़ा दिखूँ..

मनसुख बोल्यो! वो तो तुम हो गे ही, रोज खूब मक्खन, खूब घी जो खातो है। मोपे नाय इतनो दूध घी काह करूँ। तो तू पड़ोसन कुं मांग लियो कर। बोलो! मोपे माँगनों न बने, कब तक मागूंगों। 

कन्हैया बोले- तो चोरी कर लियो कर, पै मक्खन खायो कर। अच्छा लाला! तो तू मोय चोरी करानो सिखायेगो मोपे मार पड़ेगी तो बचावेगो तू..? दारी को भागतो नजर आवेगो।

कन्हैया बोले- साची कहूँ लाला तेरी सौ मैं न भागूँगो, चिन्तो नाय करे, आगे मैं ही रहूंगो। अब तो महराज बन गई मण्डली माखन चोरी की, मण्डली को नाम है- चौर विद्या प्रचार मण्डली। चोरी की विद्या का प्रचार कैसे हो, यह मण्डली का उद्देश्य था। अब तो जिसके यहां देखो उसी के यहां चोरी की खबर सुनने को मिल जाती, अब तो ऐसा हंगामा मचाया की सारी गोपियां सिकायत लेके आने लगीं जशोदा मईया के पास, कन्हैया छिपे हैं। और सारी गोपियां मां के सामने शिकायत को खड़ी हैं। 

एक गोपी ने शिकायत करते हुए कहा- मईया! सम्हालो अपना कन्हैया। मईया बोली- पर हुआ क्या? गोपी बोली- हमारे घर माखन आके खाता है। मईया बोली- री गोपी! यदी मेरा लाला, मेरे घर में नहीं पेट भर खाता, यदि तेरे घर आकर खा लिया तो तू कौन सी दरिद्र हो गई। देखो गोपी यदि मेरा कन्हैया तेरे घर आकर दो लोंदा माखन खा भी लेता है तो तू ऐसा करना, मेरे घर से चार लोंदा माखन के ले जाना, लेकिन मेरे लाला को चोर-चोर कहके बदनाम मत करना नहीं तो उसको अपनी लड़की कौन देगा?..

गोपी ने कहा- मैया तेरे चार लोंदा तू रख अपने पास। अरे तुम्हारा कन्हैया सो हमारा कन्हैया। आवे खूब खाबे कोई बात नहीं, हम तो प्रसन्न हैं, पर जब अकेला आवे तब न, सारी मण्डली को लेके आता है, सब को खिलाता है। मईया ने कहा- यही मेरे लाला का सद्गुण है वह अकेले नहीं खाता, पहले सब का पेट भरता है, फिर स्वयं खाता है। यह तो हमें भी सीखनों चाहिए। की सब मिल बांट कर खाएं और मक्खन तो खाने के लिए ही है, बो कोई मुख में लगाने के लिए थोड़ी है। अरे जाता है तो बच्चों के पेट में ही तो जाता है। उसमें तुम रो क्यों रही हो। भला ये भी कोई शिकायत करने की बात है। 

कन्हैया मां के पीछे छिपे हैं, बड़े प्रसन्न हैं, की वाह मईया हमारा बड़ा अच्छा बचाव कर रही है। फिर गोपी ने कहा- ठीक है मईया! स्वयं खाये बच्चों को भी खिलाये, लेकिन बंदरों को भी खिलाता है। “मरकान भोच्छन्” मईया ने कहा- वे भी तो विचारे जीव हैं। उनको भी तो भूख लगती है, और मेरा लाला ऐसा है उसको प्राणी मात्र के लिए दया है। तो हमें जीव मात्र के लिए दया का भाव होना चाहिए। 

यह तो मेरे लाला का सद्गुण हुआ। अच्छा मैया यह भी मान लिया लेकिन “भाण्डम भिनक्ती” फिर मटके तोड़ फोड़ देता है, उसका क्या.? मैया ने कहा- तो हम बड़े हैं, हमें समझना चाहिए, छींके में क्यों नहीं रखती मटके को, वोतो बच्चे है शरारती तो होते ही है और हमारा कन्हैया तो सबकी खबर रखता है। तुम्हारी कब की पुरानी मटकी हो गई थी, अब हम नहीं खरीदेंगे तो कुम्हार की मटकी बिके कैसे? उसे भी तो अपना पेट भरना हैं। गोपियों ने सोचा अब क्या करें…? 

ये मैया तो मानती ही नहीं। एक गोपी आई और उसने कहा- मैया अभी तो गाय दुहने का भी समय नहीं हुआ और कन्हैया आकर उन्हें छोड़ देता है और बछड़े जाकर गाय का सारा दूध पी जाते हैं, अब दुहने जाती तो कुछ बचता ही नहीं। मैया बोली- री गोपी तू अपने लाला को अपना दूध नहीं पिलातीं, ऐसे ही बछड़े को भी तो पहले पूरा अधिकार है माँ का दूध पीने का मेरा कन्हैया उनके अधिकार के लिए लड़ता है इसमें भला शिकायत करने की क्या बात है। माता यशोदा ने गोपियों की एक भी बात नहीं मानी, नहीं सुनी। 

आज की यशोदा भी अपने कन्हैया की शिकायत नहीं सुनती, न हो ही नहीं सकता। मेरा लाला तो बड़ा सुधा है। भगवान कन्हैया की लीलाओं में रहस्य भरा पड़ा है। यह माखन की चोरी नहीं, यह मन की चोरी है। वैष्णव यानी हमारा मन यदि माखन जैसा हो जाए सात्विक तत्व से पूर्ण माखन सफेद होता है और सफेद सत्व का रंग है। रक्त यानी लाल रजोगुण का रंग है और काला तमोगुण का रंग है। 

तो हम सत्व से परिपूर्ण हो जाएं, माखन जैसे कोमल हो जाए। भगवान को माखन अति प्रिय है निस्साधन जीवो का यह साधन है। भक्त भगवान से कहता है- भगवन् मेरा मन बड़ा चंचल है “पुन: पुन: चल इति चञ्न्चल:” मन चलायमान है, यदि वह चलायमान नहीं होता तो आप यहाँ बैठ के घर की चिंता या चिंतन नहीं कर पाते यही मन की चंचलता है। जीव को परेशान करता है यह मन, हमने अपने मन को काबू में करने का बहुत प्रयास किया। अब तो एक ही उपाय है, यह तब ही आप में लग सकता है जब आप ही हमारे मन की चोरी करके ले जाओ। निस्साधन जीव होवे निस्साधन हो गया, साधक की अब मेरे पास कोई उपाय ही नहीं है। मतलब पूर्ण शरणागति। अब तुम जो चाहो करो, अब तो मन तुम पर तब ही लगे जब तुम चोरी करके ले जाओ इसलिए ऐसा अधिकारी जो मन की चोरी श्रीकृष्ण ने की मन की चोरी करते हैं वही मनमोहन है। चित्तचोर है।

 “वत्सान” तो वत्स का मतलब बछड़ा भी है और वैष्णव भी तो वे वैष्णवों को मुक्त करते हैं। जन्म मरण से ये देखते नहीं कि इसने फिर कितना जप तप किया। इसलिए तो किसी भक्त ने कहा पहले हम भजन करें, फिर बाद में तुम हमें मुक्ति दे दो। ये तो सौदेबाजी हुई, यह कोई इनाम नहीं यह तो परिश्रम हुआ और मैं जानता हूँ भगवन तुम्हें आज तक तुमने जितनो को तारा है उनमें कहीं न कहीं स्वार्थ था तुम्हारा भी ऐसे  मुफ्त में नहीं तारा। बताऊं वह क्या है?. मैं तो स्पष्ट कहने बालों में से हूँ और तुम को सुनना पड़ेगा।

गजराज तारो तूने आवने को जावने को, खावने पकावने को मीराबाई तारी है।
रोहिदास तारो तूने चावड़ा मढ़ावने को, गावने वजावने को गड़िका तारी है।।
नरसिमेहता को तारो व्यापार चलावने को, वेदन सुनावने को जयदेव तारो है।
तूने सबको तारा क्योंकि इनमें कुछ न कुछ खास बात थी, पर मैं तो किसी काम का नहीं हूं। न मैं नाचना जानता हूं, न गाना, न मैं विद्वान हूं न मैं व्यापारी, इसलिए….
मुझे तारो वामे आपकी बड़ाई है।
यदि पूर्ण शरणागत हुए तो फिर भगवान यह नहीं देखते की इसने क्या जप-तप किया, क्या साधना की। साधना के फलस्वरूप मुक्त करते हो ऐसी बात नहीं है। अपने जो प्रियजन हैं, वत्स हैं उनको भी मुक्त कर देते हैं।

बुधवार, 6 दिसंबर 2023

गोपी कौन?.91

इस प्रकार से नाम धरके श्री कृष्ण छटा को हृदयंगम करके गर्गाचार्यजी चले गए। अब दोनों लाला धीरे-धीरे घुटनों के बल मैया के आँगन में चलना प्रारंभ कर दिये। मैया लालाओं की उँगली पकड़ के धीरे-धीरे पैया-पैया चलाना प्रारंभ करती है।

आंखों में मोटा-मोटा काजल लगाती हैं, कमर में करधनियां है, मोर की मुकुट है। पांव में पैजनिया है और कन्हैया जब ठुमक-ठुमक के चलते हैं तो देवता भी इनकी झांकी को देखने के लिए तरसते हैं।
कालेन ब्रजताल्पेन गोकुले रामकेशवौ। 
जानुभ्यां सह पाणिभ्यां रिड़्गमाणौ बिजह्रतुः।।
दोनों लाला मैया की उंगली पकड़कर चलना सीख रहे हैं। कभी मैया लाला का दिव्य श्रृंगार करती है और लाला घुटनों के बल चलकर गौशाला में जा पहुंचते हैं। अब वहां जब गोबर दिखाई पड़ता है तो गोविंद गोबर  लेके पूरे शरीर की मालिस करने लगते हैं। मैया मोय यायी गोबर में नहवावे, अरे आज अपने मन ते ही नहायलो। 
मईया जब गाय के गोबर में सने गोविंद को देखती है। तो कान पकड़ के डाँटवे लगती है। क्यों रे कनुआ! जब देखे तो गोबर कीचड़ में नहातो दीखे।

शुकदेवजी कहते हैं परीक्षित! बाल कृष्ण चाहे कीचड़ में लिपटे हों या गोबर में, उनके सौंदर्य में तनिक भी कमी नहीं होती। सुन्दरे किं न सुन्दरं सुन्दर तो हर परिस्थिति में सुन्दर होता है। पड़्काड़्गरागरुचिरौ पड़्क माने कीचड़ तो कीचड़ से सने कृष्ण भी रुचिकर नजर आते हैं। हम लोग तो कितना पाउडर क्रीम लगाते मसाज कराते हैं फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ता। यही प्रभु के सौंदर्य का चमत्कार है। अब कन्हैया तनिक बड़े हो गए हैं। कभी बछड़ों के मुख के दांत गिनने लगते हैं, कभी जलती आग की लकड़ी लैके घुमाने लग जाते हैं। कभी चंदा को माखन को लोंदा समझकर उसको पाने के लिए खीझ जाते हैं। ये सब क्रीड़ा करते अपने आंगन में अब घर के बाहर भी दौड़ने लगे और गोपियाँ उनकी एक छटा को पाने के लिए तरसती है, लालायित रहती हैं।

अब यहां पर जरा ध्यान दीजिए―
गोकुल माने ? गो यानी इंद्रियां और कुल माने समूह तो इंद्रियों का समूह ऐसा गोकुल जहां रहती हैं गोपियाँ। अब गोपी माने?.. गोभि: पिवति भक्ती रसम् स गोपी। 
अपने इंद्रियों के द्वारा जो भक्ति रस का पान करे वह गोपी। गोपियों की सभी इंद्रियां भगवान में लग गई। आंख में कृष्ण हैं, कान में कृष्ण हैं, रोम-रोम में कृष्ण हैं।
“गोभि: पिवति भक्तिरसम्” गोपी आंखों के द्वारा भक्ति रस का पान करती हैं। कान के द्वारा भक्ति रस का पान करती हैं। इसका अर्थ क्या कि गोपी आंखों के द्वारा श्रीकृष्ण का दर्शन करती है, जिसके कान श्रीहरि कथा का श्रवण करते हैं। जिसका मुख, जिह्वा सिर्फ कृष्ण नाम का संकीर्तन करती है। जिसकी सारी इंद्रियां भगवान में लगी हैं। अपनी इंद्रियों से जो भक्ति रसामृत का पान कर रही हैं, उनका नाम है गोपी। 

गोपी कोई स्त्री विशेष का नाम नहीं है, वह पुरुष भी हो सकता है, स्त्री भी हो सकती है, बालक भी हो सकता है, वृद्ध भी हो सकता है। गोपी शब्द का दूसरा अर्थ भी बताया.. गोपायति श्री कृष्णं स्वहृदये स गोपी।
श्री कृष्ण को जो अपने हृदय में छुपाये रखती हैं उसका नाम गोपी, जिसमे गोपनीयता होती है उसके प्रेम में वह किसी को दिखाती या बताती नहीं कि मैं कृष्ण भक्त हूं। समाज जिसको जानता ही नहीं कि यह कृष्ण भक्त है, वह गोपी है। तो ऐसी हैं ब्रज की गोपियाँ।

रविवार, 4 जून 2023

नामकरण संस्कार 90

यहाँ पर लोकों के दर्शन कराने का तात्पर्य यह था कि दूध पिलाते समय माता ने सोचा आज कन्हैया इतना दूध क्यों पी रहा है तब कन्हैया अपने मुख में तीनों लोकों का दर्शन कराएं की देख मैया मेरे मुख में कितने भूके लोग बसे हैं और मैं तुम्हारा दूध पीकर तीनों लोगों को तृप्त करता हूँ, मैं खुद अकेले थोड़े ही पीता हूँ। भगवान ने माता को अपने मुख पर दो बार लोकों का दर्शन कराया।

अब इधर वसुदेव जी ने सोचा एक बर्ष का हमारा लाला हो गया, पर अभी तक उसके नाम का पता नहीं वसुदेवजी तब अपनी पुरोहित श्री गर्गाचार्यजी से बोले- गुरु जी गोकुल में हमारे दो पुत्र नन्द जी के यहाँ पर है। आप वहाँ जाकर उनका नामकरण संस्कार कर दीजिए। एक वर्ष बीत चुके अभी तक हमें उनके नाम का पता नहीं चल रहा है। तब गर्गाचार्यजी गोकुल में पधारे, बाबा नन्द को पता चल्यो तो स्वागत करवे पहुंचें, आओ महाराज बड़ी कृपा करी हमपे सुन्दर आसन दियो, पूजन करी विधिवत। 

फिर बोले- महाराज! आपको आगमन ते हमारो मन बडो प्रसन्न  है गयो है। हमारे दो लाला है तनिक उनकी कुंडली बताओ गृह दशा कैसे चल रहे है। बाबा बोले ठीक है तो काह नाम राख्यो है अपने दोनों छोरन कु। नंदबाबा बोले- ओरे नाम धरवें को तो ध्यान ही न रह्यो बोले- का अब तक नाम नहीं धर्यो।

हाँ महाराज! अब तक तो नाय धरो एक साल को छोरा होई गयो, अब तक नामइ नाय बाको। बोले- महाराज! अब आप जैसे संत पधारे तो आपइ नाम धर जाओ। गर्गाचार्यजी बोले- वो तो हम धर देंगे पर हमारी एक शर्त है। का महाराज! बोले- नन्द जी! तुम न जानो हम यदुवंशिन के आचार्य है।
यदुनामहमाचार्यः ख्यातश्च भुवि सर्वतः। सुतं मया संस्कृतं ते मन्यते देवकी सुतम्।। 7/8/10     

हम यदुवंशियों के आचार्य है, तेरे छोरा को नाम कैसे रख देंगे? और हम नाम रख देंगे तो कंस को खबर लग जाएगी, कि गर्गाचार्य जी यदुवंशीयों के आचार्य गोकुल में नाम धरवें कैसे चले गए? इसलिए यदि इसे कंस वसुदेव को लाला समझ बैठो तो आफत है जाएगी तेरे ऊपर। काऊ को भनक न पड़े, चुप्पई नाम रख वाले तो रख देंगे। 

नंदजी बोले- महाराज! मैं तो पड़ोसियों को भी भनक नहीं पड़ने दूंगा। बस आप चुप्पई गोशाला में पधारों मैं वाइते लाला को लाऊ चुप्पई नाम धरो और चले जाओ।

ठीक है! हम राजी है, गर्गाचार्य जी गौशाला में लगा आसन जम गए। नंदबाबा अंदर खबर करी अरी मेहर झट लाला कुं लैके गोशाला में आ जाओ नाम रखवाए बे को, ठीक है महाराज! अब दोनों माताएं अपने लाल को सजाए करके श्रृंगार करके मोटो मोटो काजर लगाए के बाहर आईं। जैसे ही दूर से गर्गाचार्यजी को देखो तो आपस में ही अदला बदली कर लई। बोली- नेक या बाबा की परीक्षा तो ले, बड़ो नाम सुन राखो है या के, अब पक़्को पंडित होएगो तो बताएं देगो, कौन किसको छोरा है। तो दोनों माताएं छोरन की अदला बदली करके बाबा के सामने आ गई। माताओं ने प्रणाम किया तो बाबा ने देखा कि रोहणी मैया की गोद में नन्द के आनंद और यशोदा मईया की गोद में रोहणी नंदन और जैसे ही यशोदानंदन का दर्शन किया गर्गाचार्य जी ने सोई समाधी लग गयी। मुख खुलो आँखें खुली और श्वास रुक गई, क्यों? महाराज साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर निराकार निर्गुण निर्विशेष परमात्मा मेरे सम उपस्थित हुआ है। निर्निमेष नैनो से निरंतर निहारते ही चले गए। उस दिव्य आनंद की समाधि लग गयी। अब सामने मईया बैठ गई। मइया ने सोचा ये बाबा आंखें खोल के मेरे लाला की एक-एक रेखा देख रहे  होएगें। या के भविष्य के ताई कछु अपनी दिव्य दृष्टि से निहार रहे होंगे। पर मैया को बैठे-बैठे जब घंटा भर बीत गए, तब मइया हाथ जोड़कर बोली- महाराज! ऐसी आंखें फाड़ के कब तक देखते रहेंगे अब बाबा हो तो नाम धरे। 
मैया बोली- महाराज! कछू तो बोलो, बाबा जी न बोले। फिर इशारे में मैया रोहिणी से बोली बहन नेक देख तो या बाबा को काह है गयो है। ना बोले, न हिले डुले, ना पलकई गिरे, रोहणी जी ने देखा, फिर बोली- मालूम पड़े की सांसउँ न चलें। क्या? अरे या बाबा मेरई घर कलंक लगावें को मिलो जो यही पधारि गए। पधारनो होय तो बाहर जाके पधारो महाराज। 

अब मइया तो घबराय गयी, सो हाथ पकड़के हिलाए दिये। ऐ महाराज! बाबा सावधान होकर मुस्कुराकर बोले- हाँ हाँ मइया मैंने तेरे लाला को नाम सोच लियो। अरे महाराज ऐसे नाम सोचे, आप तो ऐसे नाम सोचो कि मैं ही सोच में पड़ गई। अब ये बताओ काह नाम विचार कियो है आपने। 

बाबा बोले- मैं आया तो था याको नाम देंवे कुं, पर मैं तो अपनो ही नाम भूल गयो। जैसे-तैसे गर्गाचार्यजी अपने आप को संभाल के पुन: दोनों बालकों को निहारने लगे। विचार किया और मुस्कुराए ये कैसे हो सकता है, यहाँ अदला बदली तो नहीं हो गई। ये माताजी हमारी परीक्षा तो नहीं लेना चाहती। तब बाबा, यशोदा से बोले सुन यशोदा- अयं हि रोहणी पुत्रो रमयन् सुहदो गुणैः । आख्यास्यते राम इति बलाधिक्याद् वलं बिदुः।। 

अरी मइया तेरी गोद में ये जो लाला है न, ये निश्चित रूप में रोहिणी को लाला है। यशोदा जी मुस्कुरा कर रोहणी की तरफ देखवे लगी। बहना चोखो पंडित निकरो। देखले एक दृष्टि में याने कितनी जल्दी पहचान लियो की या तेरो छोरा है। फिर हाथ जोड़कर बोली- हाँ बाबा आपने ठीक कही महाराज! हम दोनों छोरन में एकउ अंतर ना समझे एकइ माया समझो महाराज। 

बाबा बोले- मैया या छोरा आगे चले बहुत बड़ो बलवान निकसे गो, ता से याको नाम बलराम रखते हैं। बलाधिक्याद् बलं विदुः दूसरों नाम में इसे तो संकर्षण भी कह्यौ करेंगे। मइया बोली- बाबा! अब नेक या छोटे छोरा को नाम और बतादो।

बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते। गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जनाः।। मइया या जो छोटो छोरा है न, याके तो हजारन नाम है। मइया बोली- हमें हजारन नाम नहीं महाराज अच्छो चोखो सो एक नाम बताए दो। बाबा बोले- मइया तो या समय याको नाम रख रहे हैं हम, कृष्ण। ये कैसो नाम है या कुं बोलवें में तो मेरी जीभइ पलटा खा जाएगी। का मतलब होय महाराज याको। 

बाबा बोले- मइया! याको मतलब होय कर्षयति इति कृष्णः जो सबको मन चित्त सब अपनी ओर आकर्षित कर ले बाको नाम कृष्ण, और सुन मइया या तेरे लाला को हर युग में जन्म होयो करें। सतयुग त्रेता सब युग में याको जन्म होयो करे। तब तक में बाबा के मुख से निकल गयो ये वसुदेव को लाला सोई कन्हैया ने इशारों कर दियो। सो बाबा संभल गए। सुन-सुन मइया या काऊ जनम में वसुदेव को छोरा भयो होयगो।
प्रागयन् वसुदेवस्य क्वचिज्जातस्तवात्मज:। वासुदेव इति श्रीमानभिज्ञा: सम्प्रचक्षते।।  सुन मइया- काऊ जन्म में या वसुदेव को छोरा रहे होयगो तासे याको एक नाम वासुदेव कृष्ण भी होएगो। 
मइया बोली- काऊ जन्म से मोय का मतलब या जन्म में तो मेरो ही है। हाँ हाँ मैया या जनम में तो तेरो ही है। बस महाराज! अब ज्यादा भविष्यवाणी मोय या की नाय सुनानी। अब मइया अपने लाला कुं लैके घर में पधारी, फिर यशोदा जी बोली- बहन एक बात तो कहनी पड़ेगी, कि बाबा बड़ो चोखो पंडित निकरो। जो 1 मिनट में बताय दियो कौन सो लाला कौन को है। पर नाम पड़े टेढ़े मेढ़े रखें, मैंने तो इसको नाम भी अब खोज लियो। काह नाम रखो?.. बोली बाबा ने इनके नाम रखे कृष्ण बलराम मैंने याके नाम रख दिए कनुआ और बलुआ। आप कुछ भी सोचके अच्छा नाम रख लो, पर मैया को लाड़ को घर को नाम ऐसा ही हुआ करे। कन्हैया कान्हा कनुआ ये सब मैया के लाड प्यार के नाम है। बोलो कृष्ण कन्हैया की जय। बलदाऊ भैया की जय।

बुधवार, 14 दिसंबर 2022

सकटभञ्जन और तृणावर्त 89

गोविंद चरणों में रति होती है, इस कथा को सुनकर। पर एक दिन प्रभु का जन्म नक्षत्र आया, मइया तो नित्य दिन उत्सव मनाती हैं। किसी न किसी बहाने, अरे आज रोहिणी नक्षत्र है! या नक्षत्र में ही कन्हैया ने जनम लियो। अरे आज बुधवार है उत्सव मनाऊंगी। आज तो जन्म नक्षत्र के दिन मैया ने बड़ा सुन्दर लाला का श्रृंगार किया थप्पी मार के सुलाय दिया। प्रभु लेटे-लेटे अचानक करवट बदल लिए। यह देखते ही मैया उछल पड़ीं, ओरे… मेरे लाला ने तो आज अपने आप ही करवट बदल लई। 

बोली- सुन रे नाई! पूरे ब्रज में लगा दें दुहाई। कहियो करवट बदलवें को बुलउआ है। सबरी गोपियां दौड़ी-दौड़ी आई मैया बधाई हैं बोली बहनाओ बार बार सबन कुं बधाई हैं। पर ज्यादा हल्ला मत मचाओ, मेरो लाल आभाळ सोयो है, जाग जायेगो अभालई सोयो। गोपियाँ बोली- जब सोरई न करनो तो हमे काय को बुलायो है। अब बधाइयां गावेगी तो सोर तो मचेगो ही। तब मैया ने सोते हुए लाला को पालना उठायों और थोड़ी दूर पर एक छकड़े के नीचे रख दियो। आँगन ते माट मटका उठाए व गाड़ी के ऊपर धर दीन्हों। बोली- अब प्रेम ते नाचो, गाओ, बजाओ कोई चिंता की बात नहीं। अब गोपियां ठुमक-ठुमक के नाचवे गावें लगी। 

सोई लाला की नींद खुल गई, नींद खुलते ही लाला ने चारों तरफ देखो, वाह!.. गीत गब रहे हैं। और जिनके लिए गीत गब रहे हैं, वो आंगन में लटक रहे हैं। बहुत देर के बाद जब भगवान ने देखा हमें तो कोई देख ही नहीं रहा, सब अपने में ही खोये है। तब भगवान ने रोना शुरू किया। अब रोने पर भी जब कोई देखने वाला नहीं, तो गुस्से में मारी एक लात गाड़ी में तो गाड़ी दूरsss.. जाके गिरी और उसी गाड़ी में था एक सकटासुर सो उसका भी गोविन्दाय नमो नमः।


माखन से भरे जितने घड़ा थे सब फूट गए। बोल नन्द के लाला की। मैया ने देखी अब तो टूटी गाड़ी फूटे मटका अरे राम-राम! देखा तो लाला पालने खेलते भये। लपक के मैया ने लाला को गोद में ले लियो देखो लाला तो मेरो ठीक-ठाक दीखे। बड़ो संतोष भयो। पर आंधी तो चली ना, तूफान आयो ना गाड़ी खड़ी-खड़ी कैसे उछल गयी। तवई दो छोरा दौड़ें-दौड़ें आए बोले- मैया! हम बतावें?.. हाँ.. बताओ बेटा! 

बोलो- मैया हम बाई खड़े भये और तुम सब नाचबे में लगी। तासे लाला की नींद खुली तो मानो सबसे पहले रोबो चालू करो। मैंने सोंची याकू उठाए के तुमको देई आऊँ और जबई मैं आगे बढ्यो, याने गाड़ी में एक लात मारी की धम्म से गाड़ी आकाश में चली गई। 

मइया बोली- दारी के भाग यहाँ से, भांग खा के तो न आयो। कल को छोरा, पैदा होवे की देरी ना भई और लात मार के गाड़ी आकाश में उड़ा दी। चल भाग यहाँ से, डांट के सभी को भगाया और छोरा सौगंध खाएं-खाएं के परेशान। मैया तेरे सिर की सौगन्ध हम साची बोले। 

पर मैया की तो चले काऊ ब्रजबासी ने बात नाय मानी। तुरंत मैया ने ब्राह्मण को बुलायो, गृह शांति का अनुष्ठान करायो दक्षिणा दीन्ही ब्राह्मणन ने आशीर्वाद दी। मैया तू चिंता नाय कर हम आशीर्वाद दे रहे हैं, यापे काऊ की अला-बला नाय आ सके, या खुद अपनी अला-बला को दूर फेंकेगो। ऐसो आशीर्वाद देके ब्राह्मण चले गए। इस प्रकार से प्रभु ने सकट भंजन किया।

एक दिन मैया लाला को खूब उछाल-उछाल के खिलाय रही, कन्हैया बड़े प्रसन्न पर उछालवो बंद करे सोई रोबे लगे। मैया परेशान कब तक उछालूं थक गयी, सो स्तनपान कराईबे लगी। तब तिरछी निगाह से देखा, ओहो मामाजी ने एक और खिलौना भेज दियो हमारे ताई। 

कन्हैया ने क्या देखा कि तृणावर्त जी आरहे हैं। अब माताजी तो उछाल रही है नहीं। तब कन्हैया ने माया के द्वारा अपना वजन बढ़ाया। बजन बढ़ा भगवान का तो माता से संभाले न सम्हले मईया ने सोची अरे काह है गयो या छोरा कुं।

अरे काह भयो या छोरा कुं इतनो बजन हो गयो। अब जैसे ही माता ने छोरा को जमीन पर बैठाया वैसे ही वह तृणावर्त कन्हैया को अपने हाथों से उठाकर आकाश में ले गया। भगवान ने उसके गले को पकड़कर जैसे ही दवाया उसके भी प्राण पखेरू उड़ गए इस तरह से भगवान ने यहाँ पर तृणावर्त का भी उद्धार किया। मैया ने झटपट लाला को उठाया गोद में और गले से लगाया। बोली- पतो नाय कहा को बला है जो मेरे लाला को हाथ धोए के पीछे पड़्यो हैं। 

मैया ने फिर से लाला की झाड़ फूंक किया, स्नान करायो काजर लगा के डिठौरा लगाया और फिर से दूध पीलावे लगी तभी दूध पीते पीते कन्हैया ने जम्भाई ली और मैया ने यहाँ पर तीनों लोकन के दर्शन लाल के मुख्य मंडल में कर लियो।