मुंह खोलकर पड़ा हुआ है। तब एक दिन ग्वाल सब घूमते हुए बछड़ों को चराते हुए वहां आए, देखा तो सोचा यह कौन सी गुफा है?. वृन्दावन में कभी ऐसी गुफा तो देखी नहीं। एक ने कहा- कन्हैया! हमने सुना है की ऐसे ही गुफाओं में बड़े बड़े संत तपस्या करें, चलो इसके अंदर चलकर देखते है।
सब दौड़े तो कन्हैया ने रोका! पर ग्वालों ने बिल्कुल न सुनी। अब जैसे उसके जीभ पर कदम रखा और भीतर पहुंचे, तो एक ने कहा- भईया! या वृन्दावन के महात्मन के तो बड़े ठाट बाट है। ऐसी सड़क बनाई है जैसे गद्दा बिछाए हो। जब द्वार पर इतनी व्यवस्था है तो अंदर कितनी सुंदरता न होगी। लम्बे लम्बे दाँत चारो तरफ थे, तो एक ने पूछो क्यों रे, ये लम्बे लम्बे सफ़ेद खूंटा काय को गाड़ राखे है। दूसरे ने कहा – अरे तुम्हे नहीं पता बाबाओं के विचित्र नियम भी होते है, यह उनका नियम होगा की बाहर से जो भीतर आये वह अपना सामान खूंटा में ही टांग दो, भीतर लेके जानो नहीं है। तो साथ में जो लिया था सबने उसी दाँत के खूंटे में टांग दिया।
अब आगे बढे तो एक ने कहा – भैया मकु तो डर लागे है, यदि यह भी वकासुर की तरह कोई दानव हुआ तो?.. दूसरे ने कहा – तो चिंता क्यों करते हो हमारे पीछे कन्हैया है न, उसी वकासुर की भांति इसे भी मार देगा। यहाँ भक्त को पूरा विश्वास है की परमात्मा हमारी रक्षा अवश्य करेगा। जीव कर्म करे डरे नहीं और अपना कर्म परमात्मा पर समर्पित करे तो भगवान काल गाल से तो क्या उसके पेट में जाकर भी बचाते हैं। भगवान ने देखा भक्त तकलीफ में है, तो स्वयं अंदर चले गए, भक्त को बचाने का संकल्प भगवान का है। भगवान अंदर पहुंचे और उसके स्वास मार्ग को अवरुद्ध कर दिया और अघासुर मारा गया। भगवान ने सबको बाहर निकाला और अघासुर के देह से दिव्य तेज निकला और भगवान में समागया।
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