जयघोष हुआ वृन्दावन में पर आवाज पहुंची ब्राह्मा जी के पास, देवताओं से पूँछा!.. क्या हुआ?.. तो बताया! आपको नहीं पता? वृज में भगवान का प्राकट्य हुआ है। उन्होंने वत्सासुर, वकासुर और आज अघासुर को मारा है। ब्रह्मा जी बोले- तब तो दर्शन करने मुझे भी चलना चाहिए।
चले ब्रह्मा, ब्रह्म का दर्शन करने, पर ह्रदय को साथ लाना भूल गए, सिर्फ बुद्धि लेके आए। इसलिए उनकी बुद्धि में शंका हुआ। यहाँ भगवान वन में एक वृक्ष के नीचे अपनी सखा मण्डली के साथ बैठे हैं। अघासुर मारकर अभी घर नहीं गए, सब अपने घर से भोजन लेके आए थे। इस समय कन्हैया 5 वर्ष के हैं। इनमे एक मधुमंगल नाम का सखा है, यह ब्राह्मण बालक है। गरीब है माता यशोदा ने कहा था की तुम रोज यहाँ आकर खालिया करो कन्हैया के साथ तो वह रोज कन्हैया के घर भोजन किया करता, पर आज कन्हैया ने कहा ये मधुमंगल तू रोज मेरे घर खाता है कभी अपने घर का भी तो मुझे खिला, तो आज मधुमंगल ने अपनी माँ से कहा – माँ कन्हैया ने कहा है, कल हम वन में भोजन करेंगे, तू अपने घर से कुछ लेके आना। तो कल कुछ अच्छा सा बना देना। माँ की आँख में आंसू आगये, बेटा घर में कुछ है ही नहीं, तो क्या बना कर दूँ। घर में खाने को होता तो तुझे कान्हा के घर क्यों जाने देती। तुझे अपने हाथों से बनाकर न खिलाती। ऐसा समझा कर माँ ने उस बालक को सुला दिया।
सुबह स्नान कराके तैयार कर दिया। मधुमंगल ने एकबार फिर बोला – माँ मैं तैयार हो गया।
क्या तुमने कुछ बनाया?..
तप अपने पुत्र को शांत करने के लिए माँ ने क्या किया, बहुत दिनों की रखी छाँछ जो बहुत खट्टी थी, उसे दे दिया की ले जाओ। मधुमंगल ने कहा – माँ वह मुझे ताज़ी छाछ खिलाता है और मैं उसे खट्टी छाछ पिलाऊँ। मेरे मित्र मुझ पर हसेंगे। माँ ने कहा – तुम एक काम करना यह किसी को मत देना, कहना यह मुझे मेरी माँ ने दिया है, किसी को नहीं खिलाऊँगा और ऐसा स मझाकर माँ ने अपने बच्चे को वन में भेज दिया। सब ग्वाल आये, यमुना किनारे बछड़े चारण कर रहे थे। तब भगवान ने अघासुर को मारा, फिर लगी सबको भूंख तो बट वृक्ष के नीचे बैठगाये। अपने अपने घर से जो लाए थे सब निकालने लगे और कन्हैया को देने लगे।
गोपियों ने कहा था बेटा अकेले मत खाना, पहले कन्हैया को खिलाना। तो कन्हैया यहाँ सबका भोजन चखते है और प्रशंसा करते हैं।
वाह तुम्हारी माँ के प्रेम की तरह यह भोजन भी मीठा है। सब मिल बांटकर खा रहे है तब मधुमंगल अकेले पेड़ के पीछे छिप कर सोचने लगा। मैं क्या खिलाऊं कन्हैया को, यह खट्टी छाछ! और खिलाता हूं तो कहेगा यह क्या लेकर आया। भगवान अपने घरसे दहीभात लेकर आये हैं, जब खाने लगे तो याद आया अरे मधुमंगल कहाँ है?.. याद क्यों आई? क्योंकि मधुमंगल रोज कन्हैया के साथ खाता है।
मित्रों ने बताया पता नहीं अभी तो यहीं था। भगवान ने आवाज लगाईं और उधर मधुमंगल जल्दी जल्दी खट्टी छाछ को पीने लगा। मन में यह सोच रहा है यदि कन्हैया ने देखा तो मांगेगा और यह खट्टी छाछ उसे मैं कैसे दूँ। यह भक्त का भाव है, हम अच्छी अच्छी चीजें खरीद के खाते हैं और मंदिर में चार चरौजी का भोग लगाते हैं। फटी नोट जिसे एक भिकारी भी नहीं लेता उसे मंदिर की आरती थाली में छोड़ जाए ऐसी भक्ति मधुमंगल की नहीं है।
अच्छी से अच्छी चीजें भगवान को समर्पित करनी चाहिए। अब हम तो खाते है, बासमती चावल! और जब घर में सत्यनारायण की पूजा हुई तो कौन सा देते है पुराना मोटा चावल, यह हमारी भक्ति की भावना है। हम तो खाते है बड़ी सुपारी पर पूजा में आएगी सस्ती छोटी सुपारी जो किसी काम की नहीं, उसका नाम ही रख दिया गया, पूजा की सुपारी। धोती लाएंगे तो ऐसी के पूछो ही मत, दुकान वाला बोलेगा ब्राह्मण को तो ऐसी ही चलेगी। आप ब्राह्मण को ला रहे हो या भगवान को?.. यदि खरीदते समय ब्राह्मण को दृष्टि करोगे तो भगवान स्वीकार नहीं करेंगे। ब्राह्मण को देने वाले भगवान है तुम्हे तो भगवान के लिए लेना चाहिए और भगवान के लिए उत्तम से उत्तम, यदि नहीं है तो “अभावे अक्षतम समर्पयामी” और जब भगवान ने दिया है, एक हजार की पीताम्बरी पहन के बैठे हो तो भगवान के लिए 100 की क्यों?..
जो उत्तम वस्तु है वह भगवान को समर्पित करें। सेवा कम करो पर अच्छा करो।
मधुमंगल छाछ पीने लगा तभी भगवान उसके पास आये, इतनी देर में उसने पूरी छाछ मुंह में भरली। अच्छा वहाँ हम सब बाँट कर खा रहे है और तू दारीके चुपके चुपके पाय जा रओ है। बता क्या छिपा राखो है मुख मे। मधुमंगल ने छाछ भरी है मुख में ज्यादा तो वह निगलते भी ना बने तभी कन्हैया ने गाल में मरी मुक्का तो सारा छाछ कन्हैया के मुख में। अच्छा तो छाछ लायो है, यह तो बड़ी अच्छी है और कन्हैया मधुमंगल के मुख को चाटने लगे। मित्र इतनी बढ़िया छाछ लाये हो और अकेले पी रहे हो मुझे दिया भी नहीं।
कन्हैया तुम्हे देने को हमारे पास कुछ नहीं है बहुत दिनों की खट्टी छाछ रखी थी उसी को माँ ने दिया। भला मैं यह तुम्हे कैसे देता।
कन्हैया ने कहा- अरे मधुमंगल तुम कहते हो तुम्हारे पास कुछ नहीं हैं! अरे तुम्हारे पास जो है वह किसी के पास नहीं है। यह भाव की “खट्टी छाछ मैं कृष्ण को नहीं पिलाऊंगा” तुम्हारे पास यह जो भाव है, वह तो अन्य के पास नहीं है।
चलो मित्र इस तरह से रोते नहीं, क्या खट्टी छाछ पीकर ही दिन काटोगे! चलो भोजन करो। ले आए मधुमंगल को अपने साथ बैठाया, बायां हाथ डाल दिया मधुमंगल के कंधे में! देखो तो यह “सखा भाव” बायां हाथ डाला कंधे में और दाहिने हाथ से दही भात का कवल लेकर खिलाया मित्र को, लो मित्र खाओ। कृष्ण के कंधे पर सर रख के मधुमंगल बहुत रोया।
अब ये लीला देखी ब्रह्मा जी ने कि एक जवाल के मुंह लगी खट्टी छाछ को जीभ लगाकर चाट रहे हैं। ये कोई कैसे ब्रह्म है. यह समझने के लिए ब्रह्मा जी ने सब बछड़ों को चुरा कर छिपा दिया। अब ग्वालों ने देखा बोले- कन्हैया! सब बछड़े कहाँ गए?.. कन्हैया ने कहा- तुम सब भोजन करो, मैं बछड़ों को लेकर आता हूँ। यहाँ फिर ब्रह्मा आए और ग्वालों को भी चुरा कर छिपा दिया। बछड़े तो मिले नहीं, जब कृष्ण वापस आएँ तो ग्वाल भी नहीं है। अरे लगता है वृन्दावन में कोई बड़ा चोर आया है। अंतर्यामी है, देखाकि यह काम तो ब्रह्मा जी का है, अरे बूढ़े बाबा हम बच्चों को क्यों परेशान करते हो।
जब शाम हुई तो श्याम ने देखा अब घर भी जाना है और ग्वाल बाल बछड़ों को ब्रह्मा जी ले गए क्या किया जाए घर जाएंगे तो गोपी पूछेंगी, कि हमारे बच्चे कहाँ गए तो क्या बताऊँगा। तब भगवान ने संकल्प मात्र से ही उतने ही ग्वाल और उतने ही बछड़े बनाए। एक ही अनेक बने और लौट आए अपने घर, सब गोपियां अपने बछड़े और बच्चों को लेकर घर चली जाती है। सुबह जाते हैं शाम को आते हैं। ऐसा एक वर्ष तक चला पर किसी को संदेह भी नहीं हुआ।
अरे राजा परीक्षित! इस एक वर्ष में गोपियों को पहले से भी ज्यादा प्रेम हुआ अपने बच्चों पर और गाय को अपने बछड़ों पर और यहाँ ब्रह्मा ने सोचा अब चलो वृंदावन में देखा जाए वहाँ क्या हो रहा है। देखा तो वही बांकेबिहारी वहीं ग्वाल वहीं बछड़े सब एक साथ खेल रहे हैं चकित हुए। कि फिर मैं जिन्हें ब्रह्मलोक ले गया वो कौन थे फिर से ब्रह्मा लोक गए तो वहाँ वही बच्चे और वही बछड़े तब ब्रह्मा जी को ज्ञान हुआ कि ये तो सच मुच ब्रह्म है सब ग्वालों और बछड़ों को लेकर आए और कृष्ण को सौंप दिया और क्षमा प्रार्थना करी।
नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय गुञ्जावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय।
वन्यस्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु
लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाङ्गजाय ॥१॥
अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य
स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि।
नेशे महि त्ववसितुं मनसाऽन्तरेण
साक्षात्तवैव किमुतात्मसुखानुभूतेः॥२॥
प्रभु आज मुझे आपकी प्रभुता का ज्ञान हुआ। मैं अपने संकल्प से सृजन करने में असमर्थ हूँ और आप अपने संकल्प से सृष्टि का सृजन करते हैं। मेरे इस अपराध को क्षमा करिये। ब्रह्मा का मोह दूर हुआ और यहाँ पृथ्वी में एक वर्ष बीत गया।
कन्हैया अब छ: वर्ष के हो गए हैं। एक कल्प का ब्रह्मा का दिवस है न, तो वहाँ तो रात हुई ही नहीं! और यहाँ एक वर्ष बीत गया। ग्वालों को अभी भी भ्रम है, की हम आज ही वन में भोजन कर रहे थे। एक वर्ष के बाद ये सब ग्वाल बछड़े अपने घर को आए, लगा यह सब आज ही हुआ है; तो घर में जाकर अपनी माताओं से बताया, मैया¡ कन्हैया ने आज ऐसी लीला की और अघासुर को मारदिया। तो मारा था एक वर्ष पहले और आज उसकी चर्चा कर रहे हैं, इस प्रकार ब्रह्मा जी का भी मोह दूर किया।
।।बोल बालकृष्णलाल की जय।।