रविवार, 20 अक्टूबर 2024

प्रभावती और नटखट कान्हा की टोली भाग 3 (95)

और तभी प्रभावती घूँघट निकाले द्वार पर आई, पीछे ग्वालों की टोली है। माँ… ओ मइया जशोदा! निकलो बाहर, तुम मानती नहीं न! कहती हो रंगे हाथ पकड़ के लाओ। आज मेरे घर में चोरी करता पकड़ा गया है। इसके मुख में माखन लगा है, इसके कपड़ों में माखन लगा है। आज यदि इसकी मेरे सामने पिटाई न हुई तो मैं यहीं बैठी रहूंगी, जाऊंगी नहीं। जब तक इसकी पिटाई होगी। 

कन्हैया ने कहा- देखा मइया…! अपने देवर को पकड़ कर लाई है और कहती है पिटाई की बात। अब मइया यशोदा यह देख कर प्रसन्न हो हंस पड़ी। ये पागल तो नहीं हो गई..। अपने देवर को लेकर पिटाई कराने आई है। 

अब यह सुनकर प्रभावती को बड़ा आश्चर्य हुआ???.. मइया हंस रही हो… अब तो इसे पीटो, यह रंगे हाथ पकड़ा गया है आज। तब यशोदा मइया बोलीं- प्रभावती देख यहां बाबा नन्द नहीं बैठे अब तू अपना घूँघट उठा और देख। प्रभावती ने घूँघट उठाया और सामने देखा तो मइया के पास कन्हैया खड़े। प्रभावती ने सोचा ये यहां कैसे?..

और मैंने हाथ किसका पकड़ रखा है?.. जैसे देखा!.. तो उसका देवर… मुए तू यहाँ कैसे आया। भाभी मैं क्या जानूं तुमने ही तो पकड़ कर लाया। अब प्रभावती समझी, कि वो जो हाथ बदलने वाली बात थी न, उसी में कुछ चाल चली है। मां यशोदा ने कहा- प्रभावती क्यों मेरे बच्चे के पीछे पड़ गई है। क्या मिलता है तुम्हें?.. आओ तुम्हारा मेरे घर बैठो, चाय नाश्ता करो। मेरे बच्चे के पीछे क्यों पड़ी हो,.. जाओ घर जाओ। अब प्रभावती को काटो तो खून नहीं, ऐसी बुरी दशा हुई। इस प्रकार से कन्हैया की माखन लीला चल रही है।

शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

प्रभावती और नटखट कान्हा की टोली भाग- 2 (94)

अब दूसरे दिन ग्वालों ने पूछा लाला आज कहाँ जानो है?.. तो एक बोला- कन्हैया वही चलते हैं प्रभावती के घर, वहाँ बड़ा मजा आता है, कल बड़ा आनंद आया, वहीं जाते हैं। जो चिढ़ता है ना, बच्चे उसे ही ज्यादा चिढ़ाते हैं। कन्हैया ने कहा- तो फिर चलो; वही चलते हैं। 


यहाँ प्रभावती को भी भरोसा था कि आज फिर वह आएगा। तो बढ़िया ताजा-ताजा माखन निकाली और मटके में भरी फिर ऊपर छींके ऊपर टांग दिया और द्वार बंद करके स्वयं अंदर छिप गईं। आई टोली देखा कि दरवाजा बंद है, तो सोचा जमुना जल भरने गयी होगी, कल की तरह। कन्हैया ने कहा- दो खड़े रहो बरामदे में जब आए तो आवाज देना। दरवाज़ा खोला धक्का मार मारकर अब इस टोली में प्रभावती का देवर भी था। बुलाया कन्हैया ने; छोटा सा था देवर, पूछा- कहाँ रखा है माखन?. बताया इस कमरे में छींके में, सुनते ही बड़ी क्रोधित हुई प्रभावती अपने देवर पर। तुझे भी देख लूंगी; तू ही सब समाचार पहुंचाता है। प्रभावती ने सोचा इतना ऊपर है ये कैसे निकालेंगे?.. लेकिन उनके पास भी तरीका था पहले पांच फिर तीन फिर दो और उसके सबसे ऊपर कन्हैया। जैसे कन्हैया ने मटका पकड़ा मित्रों ने पूछा लाला पकड़ लियो। बोले- हाँ भैया! पकड़ लियो। ठीक उसी समय प्रभावती प्रगट हो गई। अभी ठहरो, देखती हूँ सबको; अरे भागो-भागो यहाँ तो प्रभावती है। गिरे सब नीचे गिरते पड़ते भागने लगे सब और कन्हैया लटके रह गए। 

प्रभावती ने कहा- वाह! बहुत सुन्दर लाला; तेरी मइया मानती नहीं ना, ऐसे लटके रहियो। अभी बुलाकर लाती हूँ तेरी माँ को और बताती हूँ की ये है तुम्हारे लाला का पराक्रम; तब तो पिटाई होगी तुम्हारी। 

कन्हैया ने कहा- ओए प्रभावती देख, मेरी बात सुन; तू घर पर जावेगी, माँ को बुलावेगी तब तक तो बहुत देर हो जाएगी और मैं लटका रह नहीं सकता। ऐसा कर ना मुझे ही ले कर चल मेरी माँ के पास, तुझे पिटाई ही करवानी है तो ऐसे करवा। तब तक तो मेरा हाथ दुखने लगेगा। 

प्रभावती ने कहा- आए ना ठिकाने पर; कहा- लाला को, अच्छा आ जाओ! अब कन्हैया नीचे आए, मुख साफ करने लगे तो प्रभावती ने कहा- खबरदार! साफ मत करना। रंगे हाथों पकड़ के ले जाना है यशोदा मइया के पास, अब अपनी दाएं हाथ से कृष्ण का बायां हाथ पकड़ा और घूंघट निकला, क्योंकि गली में बड़े बुजुर्ग बैठे रहते है। यह मर्यादा है, ले जाने लगी हाथ पकड़ के और कन्हैया की टोली भी पीछे-पीछे चली, बाहर खड़े इंतजार कर रहे थे ना! कब निकालेगा कन्हैया?.. देखा तो उनके पीछे-पीछे चल पड़े। आगे कन्हैया को पकड़ के प्रभावती पीछे-पीछे ग्वालों की टोली, मित्र बड़े चिंतित हो गए, आज हमारा सरदार पकड़ा गया। आज इसकी पिटाई होगी, क्या करें?.. घर नजदीक ही है, लाला ने भी सोचा यदि इस स्थिति में माँ के हाथ में देती है मुझे, तो मइया नहीं छोड़ने वाली, पिटाई अवश्य होगी। कुछ तो करना पड़ेगा! 


कन्हैया ने पीछे देखा तो प्रभावती का देवर भी आ रहा था, उसे इशारा किया नजदीक आओ और प्रभावती घूंघट निकाले हुए जा रही थी, माँ के पास और कहती जाती है। चल आज तेरी पिटाई करवाती हूँ। कन्हैया ने कहा- ठीक है पर तुमने मेरी कलाई कितनी कसके पकड़ी है,  हाथ लाल हो गए। देखो; बायां हाथ छोड़ो, दायां हाथ पकड़ो, ये हाथ मेरा दुखने लगा। 

प्रभावती ने कहा- यहाँ तो तुम्हारा हाथ लाल हुआ है! घर पहुंचो माँ ऐसी थप्पड़ लगाएगी के तुम्हारा गाल लाल हो जाएगा। आज तो पिटाई करवाऊंगी, पिटवाकर ही छोडूंगी मेरा नाम प्रभावती है। लाओ अपना हाथ। कन्हैया ने हाथ छोड़ा और दूसरा हाथ दिया प्रभावती के हाथ में, लेकिन अपना नहीं; उसके देवर का! ले.. जा; तेरा तुझको समर्पित। 

अब प्रभावती ने तो लंबा घूँघट निकाला हुआ है यह देख पीछे सब ग्वाल बाल हंसने लगे। वाह कन्हैया बढ़िया तरकीब निकाली। अब कन्हैया ने अपना मुख हाथ साफ किया और दौड़ते हुए गए जहां माँ यशोदा बैठीं थी आंगन में; उनकी गोद में जाकर बैठ गए और बोले- मैया! ओ प्यारी मैया! मैया ने कहा- काह बात है बेटा कन्हैया ने कहा बस यूं ही कन्हैया का बात है बताओ भैया ये गोपियां मुझे बहुत बदनाम करती है गोकुल में भला मैं क्यों चोरी करूँ हमारे पास तो इतनी सारी गाय है इतना सारा मक्खन है मैया साँची कहूँ ये सब गोपियां तुम्हारी ईर्ष्या करती हैं। माँ यशोदा बोलीं- ईर्ष्या वो क्यों करने लगी। कन्हैया ने कहा- तेरे जैसा लाला किसी को नहीं है ना, इसलिए! मैया बोली- चुप बदमाश अपने मुंह अपनी बड़ाई करता है। नहीं माँ!.. सच में, सब गोपियां ईर्ष्या करती है। इसलिए बार बार यहाँ शिकायत लेकर आती हैं। भला मैं क्यों चोरी करने लगा, झूठ मूठ मुझे बदनाम करती हैं। मैया- ने कहा- लाला! मैं जानती हूँ मेरा लाला बहुत सीधा है, बहुत अच्छा है। 

सच में बहुत बुरी आदत है इन गोपियन की जब देखो शिकायत लेकर मेरे घर चली आती है। इसलिए तो मैं उनकी एक नहीं सुनती। फिर कन्हैया ने रोने का बहाना बनाया और बोले- क्या नहीं सुनती माँ! बस यह मुझे बदनाम किए जा रही है। देखो अब तो मुझे लोग ही चोर कहने लगे, रोज़ मुझे चिढ़ाते हैं रोज़ कोई न कोई आ जाती है। देखना अभी कोई न कोई झूठी शिकायत लेकर आती ही होगी और मैं तो बैठा हूँ तुम्हारी गोद में और मुझे चोर कहेंगे। माँ जसोदा ने कहा- अच्छा तो आने दो उसे देख लूंगी मैं। लाला शांत! हाँ माँ… देखना।

सोमवार, 18 दिसंबर 2023

प्रभावती और नटखट कान्हा की टोली भाग-1 (93)

बड़ी नटखट लीलाएं हैं, नंदनंदन की, एक बार ऐसा हुआ कि कुछ गोपियां गई जमुना जी जल भरने, तो वहाँ चर्चा हो रही थी गोपियों में। ये यशोदा के लाला ने तो बहुत उपद्रव मचायो है सारे गोकुल में, वैसे है बड़ो सुंदर। 
एक गोपी बोली- बस लगता है उसे देखते ही रहें, इतनी मनमोहनी सूरत है। 
दूसरी ने कहा- लेकिन थोड़ा काला है। 
तीसरी बोली लेकिन मतवाला है। 
चौथी बोली- बड़ा नटखट है, एक बार ऐसा हुआ। मैं और ललिता सखी दोनों बात कर रही थीं, तो न जाने कब वो पीछे से आया और चोटी बांध कर चला गया दोनों की। फिर जैसे तैसे हम दोनों उठ खड़ी हुई और अलग हुए तो धड़ाम से गिरी नीचे, बहुत उपद्रव मचाता है। 

एक गोपी ने कहा- क्या बताऊँ! मेरी चोटी तो मेरे पति के दाड़ी से बांध दी थी उसने, सुबह-सुबह मैं उठी की पहली पहल नहा धो के तैयार हो जाएं अब उठकर जैसे चलने लगी तो पति देव भी पीछे-पीछे खींचे चले आए। 

एक गोपी ने कहा- मैं पानी भर के मटके में जा रही थी की रास्ते में मिल गया और पूछने लगा तुमने नहा लिया, मैंने कहा नहीं! बस तभी एक पत्थर उठा कर मेरी मटके में दे मारा, मेरा मटका भी फूटा और मैं भी भीग गई और फिर क्या कहता है मालूम?. कि पहले नहाया करो फिर घर का काम किया करो। सच बहुत नटखट है। 

पर एक गोपी थी जिसका नाम था प्रभावती उसने कहा- वो आता होगा तुम्हारे घर चोरी करने शरारत करता होगा तुम्हारे साथ! आवे मेरे घर, ऐसा सबक सिखाऊंगी कि सब भूल जावेगो, फिर आने का नाम ही ना लेगो। तो एक गोपी का लड़का अपनी माँ के साथ आया था जमुना जी में नहाने जब उसने सुनी यह प्रभावती की बात और वो कन्हैया का CID था, गुप्तचर दौड़ता हुआ गया यह समाचार कृष्ण को देने।

एक वृक्ष के नीचे टोली बैठी थी ठिठोली करती हुई और बीच में बैठा है नायक, पीली पीतांबर है मोर पंख का मुकुट है। आकर कहा- मित्र एक समाचार लाया हूँ! क्या?.. बोला- जमुना तट पर गया था नहाने अपनी माँ के साथ, तो प्रभावती ऐसा कह रही थी। कन्हैया ने कहा- ऐसी बात है! ठीक है तो आज उसी का घर एक बाकी रह गया था। चलो आज वही होगा भंडारा, वो हमें सबक सिखाएगी आज देखते हैं। 
अब प्रभावती तो गई थी जल भरने जमुना जी में, इधर मंडली प्रभावती के घर पहुंची और किवाड़ खोला घुसे सब घर में, मटका ऊपर छींके में था तो पांच नीचे फिर तीन ऊपर चढ़े, फिर दो उनके बाद कन्हैया चढ़े, मटका उतारा नीचे और सब माखन खाने लगे। 

जमके माखन खाया अब ये जहाँ जाते थे, बंदरों की टोली भी साथ-साथ पहुँच जाती थी। तो खुद खाएं बंदरों को भी खिलाएं जब सबका पेट भर गया फिर आधा मटका माखन अभी बचा था। कन्हैया ने कहा- खाओ-खाओ! ग्वालों ने कहा- बस कन्हैया! अब तो पेट भर गया। तो फिर ऐसा करो, ये प्रभावती बहुत आलसी है, देखें लीपा पोती ठीक से करती नहीं है। अब हमने इसका माखन खाया है, बदले में कुछ तो करें। लिया एक डंडा और मारी मटका में तो सारा माखन बिखर गया और माखन लीपने लगे पूरे घर में और भी जितने दही की हांडिया थीं, सब को फोड़ दिया और बाहर निकल के जैसी कुंडी लगी थी लगा दी और पास में ही एक वृक्ष में छिप गए, अब मज़ा आएगा। 

आई प्रभावती!... हाथी जैसी चाल ठुमक-ठुमक करती हुई, नूपुर बज रहे है उसके और जमुना जल से भरा है मटका, ग्वाल सभी देखते जा रहे हैं। अब सर पे तो मटकी है, नीचे देख नहीं सकती। कुंडी खोली धक्का देकर, किवाड़ खोला और ज्यों ही पग उठाया घर में जाने के लिए, ग्वालों के मुख में मुस्कान आई। पग रखा अंदर गई की पैर फिसला गिरी धड़ाम और फिसलते हुए सामने वाली दीवार पर जाकर टकराई, वह गिरी तो मटका भी गिर के फूट गया और माखन में मिल गया। तो दीवार का आधार लेकर जो ही खड़े होने का प्रयास किया, तो फिर से फिसल गई और पहुंची फिसलती दरवाजे तक द्वार से देखा तो छींके पर मटका नहीं। नीचे देखा तो माखन लिपा है माखन का मटका भी फूटा है। उसके पूरे शरीर में माखन लगा है। अब तो सर पकड़ के बैठ गयी, क्या करूँ??..

सब ग्वाल ऐसा हंसे, लाला आज तो बहुत आनंद आया, ये हम को सबक सिखाने वाली थी। अब तो प्रभावित बैठी-बैठी बाहर निकली। खड़ा होने का प्रयास ही नहीं किया। चल पड़ी कमर पे हाथ रख के मैया यशोदा के पास!.. ओह यशोदा मैया.. जानती हो?.. तुम्हारे लाला ने आज क्या किया?.. देखो! मेरा नाम प्रभावती है। छोडूंगी नहीं, ऐसा सबक सिखाऊंगी, याद रखेगा। 

मैया ने कहा- क्या हुआ?.. प्रभावती! आओ तो… शांति से बैठो! बताओ… क्या हुआ?.. बैठने नहीं आई मैं, मेरा नाम प्रभावती है। आज मेरे घर में उपद्रव मचाया है, संभालो अपने छोरा को, नहीं एक दो थप्पड़ लगाऊंगी। मेरा नाम प्रभावती है। 

मैया बोली- मैं जानती हूँ; तेरा नाम प्रभावती है, बार-बार बताने की आवश्यकता नहीं है। क्या किया है; मेरे लाला ने?. कहा- आकर देखो मेरे घर में, चोर कहीं का! अब तो यशोदा मैया को भी गुस्सा आया। बोली- क्या किया है? सुन; देख प्रभावती! मेरे लाला को चोर मत कहियो। चोर होगा तेरा पति। हकीकत में तुम सब गोपियों के बच्चों ने मिलकर मेरे लाला को बिगाड़ दिया। वह तो जानता ही नहीं कि चोरी कहते किसे हैं और आकर मेरे लाला को खरी खोटी सुनाती हो, उसे चोर कहती हो। देखो ऐसे ही चोर मत कहना, रंगे हाथों पकड़ के लाओ तो मैं सुनूंगी तुम्हारी शिकायत, अभी तुम जाओ यहाँ से। 
अब प्रभावती ने भी ठान लिया, मैया! अब इस बार कन्हैया को तुम्हारे हाथ में पकड़ा नहीं दिया; तो मेरा नाम प्रभावती नहीं। इतना कहकर वह अपने घर गई और कन्हैया बड़े प्रसन्न हुए। 

शनिवार, 16 दिसंबर 2023

माखन चोरी लीला 92

“अति प्रिय मधुर तोतरी बोली” 
अब भगवान श्रीकृष्ण बोलना सीख गए, उनकी बोली अति मधुर और तोतरी है। अब बहुत सारे इनके मित्र हुए, इन मित्रों के साथ में खेलते हैं कृष्ण और बलदाऊ। श्रीदामा, सुबल, मधुमंगल, मनसुख बहुत सारे मित्र हैं। तो मनसुख जो था वह दुबला पतला था। कन्हैया ने पूंछा! मित्र  तो तुम्हारा नाम क्या है? उसने बताया मनसुख। कन्हैया बोले- तुम मन सुख भी नहीं हो और तन सुख भी नहीं हो, कैसे दुबले पतले हो। 

देखो मनसुख मुझे अच्छा नहीं लगता कि मेरा कोई मित्र पतला दुबला हो, तुम माखन खाकर तगड़े क्यों नहीं होते। देखो मैं कैसो तगड़ा दिखूँ..

मनसुख बोल्यो! वो तो तुम हो गे ही, रोज खूब मक्खन, खूब घी जो खातो है। मोपे नाय इतनो दूध घी काह करूँ। तो तू पड़ोसन कुं मांग लियो कर। बोलो! मोपे माँगनों न बने, कब तक मागूंगों। 

कन्हैया बोले- तो चोरी कर लियो कर, पै मक्खन खायो कर। अच्छा लाला! तो तू मोय चोरी करानो सिखायेगो मोपे मार पड़ेगी तो बचावेगो तू..? दारी को भागतो नजर आवेगो।

कन्हैया बोले- साची कहूँ लाला तेरी सौ मैं न भागूँगो, चिन्तो नाय करे, आगे मैं ही रहूंगो। अब तो महराज बन गई मण्डली माखन चोरी की, मण्डली को नाम है- चौर विद्या प्रचार मण्डली। चोरी की विद्या का प्रचार कैसे हो, यह मण्डली का उद्देश्य था। अब तो जिसके यहां देखो उसी के यहां चोरी की खबर सुनने को मिल जाती, अब तो ऐसा हंगामा मचाया की सारी गोपियां सिकायत लेके आने लगीं जशोदा मईया के पास, कन्हैया छिपे हैं। और सारी गोपियां मां के सामने शिकायत को खड़ी हैं। 

एक गोपी ने शिकायत करते हुए कहा- मईया! सम्हालो अपना कन्हैया। मईया बोली- पर हुआ क्या? गोपी बोली- हमारे घर माखन आके खाता है। मईया बोली- री गोपी! यदी मेरा लाला, मेरे घर में नहीं पेट भर खाता, यदि तेरे घर आकर खा लिया तो तू कौन सी दरिद्र हो गई। देखो गोपी यदि मेरा कन्हैया तेरे घर आकर दो लोंदा माखन खा भी लेता है तो तू ऐसा करना, मेरे घर से चार लोंदा माखन के ले जाना, लेकिन मेरे लाला को चोर-चोर कहके बदनाम मत करना नहीं तो उसको अपनी लड़की कौन देगा?..

गोपी ने कहा- मैया तेरे चार लोंदा तू रख अपने पास। अरे तुम्हारा कन्हैया सो हमारा कन्हैया। आवे खूब खाबे कोई बात नहीं, हम तो प्रसन्न हैं, पर जब अकेला आवे तब न, सारी मण्डली को लेके आता है, सब को खिलाता है। मईया ने कहा- यही मेरे लाला का सद्गुण है वह अकेले नहीं खाता, पहले सब का पेट भरता है, फिर स्वयं खाता है। यह तो हमें भी सीखनों चाहिए। की सब मिल बांट कर खाएं और मक्खन तो खाने के लिए ही है, बो कोई मुख में लगाने के लिए थोड़ी है। अरे जाता है तो बच्चों के पेट में ही तो जाता है। उसमें तुम रो क्यों रही हो। भला ये भी कोई शिकायत करने की बात है। 

कन्हैया मां के पीछे छिपे हैं, बड़े प्रसन्न हैं, की वाह मईया हमारा बड़ा अच्छा बचाव कर रही है। फिर गोपी ने कहा- ठीक है मईया! स्वयं खाये बच्चों को भी खिलाये, लेकिन बंदरों को भी खिलाता है। “मरकान भोच्छन्” मईया ने कहा- वे भी तो विचारे जीव हैं। उनको भी तो भूख लगती है, और मेरा लाला ऐसा है उसको प्राणी मात्र के लिए दया है। तो हमें जीव मात्र के लिए दया का भाव होना चाहिए। 

यह तो मेरे लाला का सद्गुण हुआ। अच्छा मैया यह भी मान लिया लेकिन “भाण्डम भिनक्ती” फिर मटके तोड़ फोड़ देता है, उसका क्या.? मैया ने कहा- तो हम बड़े हैं, हमें समझना चाहिए, छींके में क्यों नहीं रखती मटके को, वोतो बच्चे है शरारती तो होते ही है और हमारा कन्हैया तो सबकी खबर रखता है। तुम्हारी कब की पुरानी मटकी हो गई थी, अब हम नहीं खरीदेंगे तो कुम्हार की मटकी बिके कैसे? उसे भी तो अपना पेट भरना हैं। गोपियों ने सोचा अब क्या करें…? 

ये मैया तो मानती ही नहीं। एक गोपी आई और उसने कहा- मैया अभी तो गाय दुहने का भी समय नहीं हुआ और कन्हैया आकर उन्हें छोड़ देता है और बछड़े जाकर गाय का सारा दूध पी जाते हैं, अब दुहने जाती तो कुछ बचता ही नहीं। मैया बोली- री गोपी तू अपने लाला को अपना दूध नहीं पिलातीं, ऐसे ही बछड़े को भी तो पहले पूरा अधिकार है माँ का दूध पीने का मेरा कन्हैया उनके अधिकार के लिए लड़ता है इसमें भला शिकायत करने की क्या बात है। माता यशोदा ने गोपियों की एक भी बात नहीं मानी, नहीं सुनी। 

आज की यशोदा भी अपने कन्हैया की शिकायत नहीं सुनती, न हो ही नहीं सकता। मेरा लाला तो बड़ा सुधा है। भगवान कन्हैया की लीलाओं में रहस्य भरा पड़ा है। यह माखन की चोरी नहीं, यह मन की चोरी है। वैष्णव यानी हमारा मन यदि माखन जैसा हो जाए सात्विक तत्व से पूर्ण माखन सफेद होता है और सफेद सत्व का रंग है। रक्त यानी लाल रजोगुण का रंग है और काला तमोगुण का रंग है। 

तो हम सत्व से परिपूर्ण हो जाएं, माखन जैसे कोमल हो जाए। भगवान को माखन अति प्रिय है निस्साधन जीवो का यह साधन है। भक्त भगवान से कहता है- भगवन् मेरा मन बड़ा चंचल है “पुन: पुन: चल इति चञ्न्चल:” मन चलायमान है, यदि वह चलायमान नहीं होता तो आप यहाँ बैठ के घर की चिंता या चिंतन नहीं कर पाते यही मन की चंचलता है। जीव को परेशान करता है यह मन, हमने अपने मन को काबू में करने का बहुत प्रयास किया। अब तो एक ही उपाय है, यह तब ही आप में लग सकता है जब आप ही हमारे मन की चोरी करके ले जाओ। निस्साधन जीव होवे निस्साधन हो गया, साधक की अब मेरे पास कोई उपाय ही नहीं है। मतलब पूर्ण शरणागति। अब तुम जो चाहो करो, अब तो मन तुम पर तब ही लगे जब तुम चोरी करके ले जाओ इसलिए ऐसा अधिकारी जो मन की चोरी श्रीकृष्ण ने की मन की चोरी करते हैं वही मनमोहन है। चित्तचोर है।

 “वत्सान” तो वत्स का मतलब बछड़ा भी है और वैष्णव भी तो वे वैष्णवों को मुक्त करते हैं। जन्म मरण से ये देखते नहीं कि इसने फिर कितना जप तप किया। इसलिए तो किसी भक्त ने कहा पहले हम भजन करें, फिर बाद में तुम हमें मुक्ति दे दो। ये तो सौदेबाजी हुई, यह कोई इनाम नहीं यह तो परिश्रम हुआ और मैं जानता हूँ भगवन तुम्हें आज तक तुमने जितनो को तारा है उनमें कहीं न कहीं स्वार्थ था तुम्हारा भी ऐसे  मुफ्त में नहीं तारा। बताऊं वह क्या है?. मैं तो स्पष्ट कहने बालों में से हूँ और तुम को सुनना पड़ेगा।

गजराज तारो तूने आवने को जावने को, खावने पकावने को मीराबाई तारी है।
रोहिदास तारो तूने चावड़ा मढ़ावने को, गावने वजावने को गड़िका तारी है।।
नरसिमेहता को तारो व्यापार चलावने को, वेदन सुनावने को जयदेव तारो है।
तूने सबको तारा क्योंकि इनमें कुछ न कुछ खास बात थी, पर मैं तो किसी काम का नहीं हूं। न मैं नाचना जानता हूं, न गाना, न मैं विद्वान हूं न मैं व्यापारी, इसलिए….
मुझे तारो वामे आपकी बड़ाई है।
यदि पूर्ण शरणागत हुए तो फिर भगवान यह नहीं देखते की इसने क्या जप-तप किया, क्या साधना की। साधना के फलस्वरूप मुक्त करते हो ऐसी बात नहीं है। अपने जो प्रियजन हैं, वत्स हैं उनको भी मुक्त कर देते हैं।

बुधवार, 6 दिसंबर 2023

गोपी कौन?.91

इस प्रकार से नाम धरके श्री कृष्ण छटा को हृदयंगम करके गर्गाचार्यजी चले गए। अब दोनों लाला धीरे-धीरे घुटनों के बल मैया के आँगन में चलना प्रारंभ कर दिये। मैया लालाओं की उँगली पकड़ के धीरे-धीरे पैया-पैया चलाना प्रारंभ करती है।

आंखों में मोटा-मोटा काजल लगाती हैं, कमर में करधनियां है, मोर की मुकुट है। पांव में पैजनिया है और कन्हैया जब ठुमक-ठुमक के चलते हैं तो देवता भी इनकी झांकी को देखने के लिए तरसते हैं।
कालेन ब्रजताल्पेन गोकुले रामकेशवौ। 
जानुभ्यां सह पाणिभ्यां रिड़्गमाणौ बिजह्रतुः।।
दोनों लाला मैया की उंगली पकड़कर चलना सीख रहे हैं। कभी मैया लाला का दिव्य श्रृंगार करती है और लाला घुटनों के बल चलकर गौशाला में जा पहुंचते हैं। अब वहां जब गोबर दिखाई पड़ता है तो गोविंद गोबर  लेके पूरे शरीर की मालिस करने लगते हैं। मैया मोय यायी गोबर में नहवावे, अरे आज अपने मन ते ही नहायलो। 
मईया जब गाय के गोबर में सने गोविंद को देखती है। तो कान पकड़ के डाँटवे लगती है। क्यों रे कनुआ! जब देखे तो गोबर कीचड़ में नहातो दीखे।

शुकदेवजी कहते हैं परीक्षित! बाल कृष्ण चाहे कीचड़ में लिपटे हों या गोबर में, उनके सौंदर्य में तनिक भी कमी नहीं होती। सुन्दरे किं न सुन्दरं सुन्दर तो हर परिस्थिति में सुन्दर होता है। पड़्काड़्गरागरुचिरौ पड़्क माने कीचड़ तो कीचड़ से सने कृष्ण भी रुचिकर नजर आते हैं। हम लोग तो कितना पाउडर क्रीम लगाते मसाज कराते हैं फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ता। यही प्रभु के सौंदर्य का चमत्कार है। अब कन्हैया तनिक बड़े हो गए हैं। कभी बछड़ों के मुख के दांत गिनने लगते हैं, कभी जलती आग की लकड़ी लैके घुमाने लग जाते हैं। कभी चंदा को माखन को लोंदा समझकर उसको पाने के लिए खीझ जाते हैं। ये सब क्रीड़ा करते अपने आंगन में अब घर के बाहर भी दौड़ने लगे और गोपियाँ उनकी एक छटा को पाने के लिए तरसती है, लालायित रहती हैं।

अब यहां पर जरा ध्यान दीजिए―
गोकुल माने ? गो यानी इंद्रियां और कुल माने समूह तो इंद्रियों का समूह ऐसा गोकुल जहां रहती हैं गोपियाँ। अब गोपी माने?.. गोभि: पिवति भक्ती रसम् स गोपी। 
अपने इंद्रियों के द्वारा जो भक्ति रस का पान करे वह गोपी। गोपियों की सभी इंद्रियां भगवान में लग गई। आंख में कृष्ण हैं, कान में कृष्ण हैं, रोम-रोम में कृष्ण हैं।
“गोभि: पिवति भक्तिरसम्” गोपी आंखों के द्वारा भक्ति रस का पान करती हैं। कान के द्वारा भक्ति रस का पान करती हैं। इसका अर्थ क्या कि गोपी आंखों के द्वारा श्रीकृष्ण का दर्शन करती है, जिसके कान श्रीहरि कथा का श्रवण करते हैं। जिसका मुख, जिह्वा सिर्फ कृष्ण नाम का संकीर्तन करती है। जिसकी सारी इंद्रियां भगवान में लगी हैं। अपनी इंद्रियों से जो भक्ति रसामृत का पान कर रही हैं, उनका नाम है गोपी। 

गोपी कोई स्त्री विशेष का नाम नहीं है, वह पुरुष भी हो सकता है, स्त्री भी हो सकती है, बालक भी हो सकता है, वृद्ध भी हो सकता है। गोपी शब्द का दूसरा अर्थ भी बताया.. गोपायति श्री कृष्णं स्वहृदये स गोपी।
श्री कृष्ण को जो अपने हृदय में छुपाये रखती हैं उसका नाम गोपी, जिसमे गोपनीयता होती है उसके प्रेम में वह किसी को दिखाती या बताती नहीं कि मैं कृष्ण भक्त हूं। समाज जिसको जानता ही नहीं कि यह कृष्ण भक्त है, वह गोपी है। तो ऐसी हैं ब्रज की गोपियाँ।

रविवार, 4 जून 2023

नामकरण संस्कार 90

यहाँ पर लोकों के दर्शन कराने का तात्पर्य यह था कि दूध पिलाते समय माता ने सोचा आज कन्हैया इतना दूध क्यों पी रहा है तब कन्हैया अपने मुख में तीनों लोकों का दर्शन कराएं की देख मैया मेरे मुख में कितने भूके लोग बसे हैं और मैं तुम्हारा दूध पीकर तीनों लोगों को तृप्त करता हूँ, मैं खुद अकेले थोड़े ही पीता हूँ। भगवान ने माता को अपने मुख पर दो बार लोकों का दर्शन कराया।

अब इधर वसुदेव जी ने सोचा एक बर्ष का हमारा लाला हो गया, पर अभी तक उसके नाम का पता नहीं वसुदेवजी तब अपनी पुरोहित श्री गर्गाचार्यजी से बोले- गुरु जी गोकुल में हमारे दो पुत्र नन्द जी के यहाँ पर है। आप वहाँ जाकर उनका नामकरण संस्कार कर दीजिए। एक वर्ष बीत चुके अभी तक हमें उनके नाम का पता नहीं चल रहा है। तब गर्गाचार्यजी गोकुल में पधारे, बाबा नन्द को पता चल्यो तो स्वागत करवे पहुंचें, आओ महाराज बड़ी कृपा करी हमपे सुन्दर आसन दियो, पूजन करी विधिवत। 

फिर बोले- महाराज! आपको आगमन ते हमारो मन बडो प्रसन्न  है गयो है। हमारे दो लाला है तनिक उनकी कुंडली बताओ गृह दशा कैसे चल रहे है। बाबा बोले ठीक है तो काह नाम राख्यो है अपने दोनों छोरन कु। नंदबाबा बोले- ओरे नाम धरवें को तो ध्यान ही न रह्यो बोले- का अब तक नाम नहीं धर्यो।

हाँ महाराज! अब तक तो नाय धरो एक साल को छोरा होई गयो, अब तक नामइ नाय बाको। बोले- महाराज! अब आप जैसे संत पधारे तो आपइ नाम धर जाओ। गर्गाचार्यजी बोले- वो तो हम धर देंगे पर हमारी एक शर्त है। का महाराज! बोले- नन्द जी! तुम न जानो हम यदुवंशिन के आचार्य है।
यदुनामहमाचार्यः ख्यातश्च भुवि सर्वतः। सुतं मया संस्कृतं ते मन्यते देवकी सुतम्।। 7/8/10     

हम यदुवंशियों के आचार्य है, तेरे छोरा को नाम कैसे रख देंगे? और हम नाम रख देंगे तो कंस को खबर लग जाएगी, कि गर्गाचार्य जी यदुवंशीयों के आचार्य गोकुल में नाम धरवें कैसे चले गए? इसलिए यदि इसे कंस वसुदेव को लाला समझ बैठो तो आफत है जाएगी तेरे ऊपर। काऊ को भनक न पड़े, चुप्पई नाम रख वाले तो रख देंगे। 

नंदजी बोले- महाराज! मैं तो पड़ोसियों को भी भनक नहीं पड़ने दूंगा। बस आप चुप्पई गोशाला में पधारों मैं वाइते लाला को लाऊ चुप्पई नाम धरो और चले जाओ।

ठीक है! हम राजी है, गर्गाचार्य जी गौशाला में लगा आसन जम गए। नंदबाबा अंदर खबर करी अरी मेहर झट लाला कुं लैके गोशाला में आ जाओ नाम रखवाए बे को, ठीक है महाराज! अब दोनों माताएं अपने लाल को सजाए करके श्रृंगार करके मोटो मोटो काजर लगाए के बाहर आईं। जैसे ही दूर से गर्गाचार्यजी को देखो तो आपस में ही अदला बदली कर लई। बोली- नेक या बाबा की परीक्षा तो ले, बड़ो नाम सुन राखो है या के, अब पक़्को पंडित होएगो तो बताएं देगो, कौन किसको छोरा है। तो दोनों माताएं छोरन की अदला बदली करके बाबा के सामने आ गई। माताओं ने प्रणाम किया तो बाबा ने देखा कि रोहणी मैया की गोद में नन्द के आनंद और यशोदा मईया की गोद में रोहणी नंदन और जैसे ही यशोदानंदन का दर्शन किया गर्गाचार्य जी ने सोई समाधी लग गयी। मुख खुलो आँखें खुली और श्वास रुक गई, क्यों? महाराज साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर निराकार निर्गुण निर्विशेष परमात्मा मेरे सम उपस्थित हुआ है। निर्निमेष नैनो से निरंतर निहारते ही चले गए। उस दिव्य आनंद की समाधि लग गयी। अब सामने मईया बैठ गई। मइया ने सोचा ये बाबा आंखें खोल के मेरे लाला की एक-एक रेखा देख रहे  होएगें। या के भविष्य के ताई कछु अपनी दिव्य दृष्टि से निहार रहे होंगे। पर मैया को बैठे-बैठे जब घंटा भर बीत गए, तब मइया हाथ जोड़कर बोली- महाराज! ऐसी आंखें फाड़ के कब तक देखते रहेंगे अब बाबा हो तो नाम धरे। 
मैया बोली- महाराज! कछू तो बोलो, बाबा जी न बोले। फिर इशारे में मैया रोहिणी से बोली बहन नेक देख तो या बाबा को काह है गयो है। ना बोले, न हिले डुले, ना पलकई गिरे, रोहणी जी ने देखा, फिर बोली- मालूम पड़े की सांसउँ न चलें। क्या? अरे या बाबा मेरई घर कलंक लगावें को मिलो जो यही पधारि गए। पधारनो होय तो बाहर जाके पधारो महाराज। 

अब मइया तो घबराय गयी, सो हाथ पकड़के हिलाए दिये। ऐ महाराज! बाबा सावधान होकर मुस्कुराकर बोले- हाँ हाँ मइया मैंने तेरे लाला को नाम सोच लियो। अरे महाराज ऐसे नाम सोचे, आप तो ऐसे नाम सोचो कि मैं ही सोच में पड़ गई। अब ये बताओ काह नाम विचार कियो है आपने। 

बाबा बोले- मैं आया तो था याको नाम देंवे कुं, पर मैं तो अपनो ही नाम भूल गयो। जैसे-तैसे गर्गाचार्यजी अपने आप को संभाल के पुन: दोनों बालकों को निहारने लगे। विचार किया और मुस्कुराए ये कैसे हो सकता है, यहाँ अदला बदली तो नहीं हो गई। ये माताजी हमारी परीक्षा तो नहीं लेना चाहती। तब बाबा, यशोदा से बोले सुन यशोदा- अयं हि रोहणी पुत्रो रमयन् सुहदो गुणैः । आख्यास्यते राम इति बलाधिक्याद् वलं बिदुः।। 

अरी मइया तेरी गोद में ये जो लाला है न, ये निश्चित रूप में रोहिणी को लाला है। यशोदा जी मुस्कुरा कर रोहणी की तरफ देखवे लगी। बहना चोखो पंडित निकरो। देखले एक दृष्टि में याने कितनी जल्दी पहचान लियो की या तेरो छोरा है। फिर हाथ जोड़कर बोली- हाँ बाबा आपने ठीक कही महाराज! हम दोनों छोरन में एकउ अंतर ना समझे एकइ माया समझो महाराज। 

बाबा बोले- मैया या छोरा आगे चले बहुत बड़ो बलवान निकसे गो, ता से याको नाम बलराम रखते हैं। बलाधिक्याद् बलं विदुः दूसरों नाम में इसे तो संकर्षण भी कह्यौ करेंगे। मइया बोली- बाबा! अब नेक या छोटे छोरा को नाम और बतादो।

बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते। गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जनाः।। मइया या जो छोटो छोरा है न, याके तो हजारन नाम है। मइया बोली- हमें हजारन नाम नहीं महाराज अच्छो चोखो सो एक नाम बताए दो। बाबा बोले- मइया तो या समय याको नाम रख रहे हैं हम, कृष्ण। ये कैसो नाम है या कुं बोलवें में तो मेरी जीभइ पलटा खा जाएगी। का मतलब होय महाराज याको। 

बाबा बोले- मइया! याको मतलब होय कर्षयति इति कृष्णः जो सबको मन चित्त सब अपनी ओर आकर्षित कर ले बाको नाम कृष्ण, और सुन मइया या तेरे लाला को हर युग में जन्म होयो करें। सतयुग त्रेता सब युग में याको जन्म होयो करे। तब तक में बाबा के मुख से निकल गयो ये वसुदेव को लाला सोई कन्हैया ने इशारों कर दियो। सो बाबा संभल गए। सुन-सुन मइया या काऊ जनम में वसुदेव को छोरा भयो होयगो।
प्रागयन् वसुदेवस्य क्वचिज्जातस्तवात्मज:। वासुदेव इति श्रीमानभिज्ञा: सम्प्रचक्षते।।  सुन मइया- काऊ जन्म में या वसुदेव को छोरा रहे होयगो तासे याको एक नाम वासुदेव कृष्ण भी होएगो। 
मइया बोली- काऊ जन्म से मोय का मतलब या जन्म में तो मेरो ही है। हाँ हाँ मैया या जनम में तो तेरो ही है। बस महाराज! अब ज्यादा भविष्यवाणी मोय या की नाय सुनानी। अब मइया अपने लाला कुं लैके घर में पधारी, फिर यशोदा जी बोली- बहन एक बात तो कहनी पड़ेगी, कि बाबा बड़ो चोखो पंडित निकरो। जो 1 मिनट में बताय दियो कौन सो लाला कौन को है। पर नाम पड़े टेढ़े मेढ़े रखें, मैंने तो इसको नाम भी अब खोज लियो। काह नाम रखो?.. बोली बाबा ने इनके नाम रखे कृष्ण बलराम मैंने याके नाम रख दिए कनुआ और बलुआ। आप कुछ भी सोचके अच्छा नाम रख लो, पर मैया को लाड़ को घर को नाम ऐसा ही हुआ करे। कन्हैया कान्हा कनुआ ये सब मैया के लाड प्यार के नाम है। बोलो कृष्ण कन्हैया की जय। बलदाऊ भैया की जय।

बुधवार, 14 दिसंबर 2022

सकटभञ्जन और तृणावर्त 89

गोविंद चरणों में रति होती है, इस कथा को सुनकर। पर एक दिन प्रभु का जन्म नक्षत्र आया, मइया तो नित्य दिन उत्सव मनाती हैं। किसी न किसी बहाने, अरे आज रोहिणी नक्षत्र है! या नक्षत्र में ही कन्हैया ने जनम लियो। अरे आज बुधवार है उत्सव मनाऊंगी। आज तो जन्म नक्षत्र के दिन मैया ने बड़ा सुन्दर लाला का श्रृंगार किया थप्पी मार के सुलाय दिया। प्रभु लेटे-लेटे अचानक करवट बदल लिए। यह देखते ही मैया उछल पड़ीं, ओरे… मेरे लाला ने तो आज अपने आप ही करवट बदल लई। 

बोली- सुन रे नाई! पूरे ब्रज में लगा दें दुहाई। कहियो करवट बदलवें को बुलउआ है। सबरी गोपियां दौड़ी-दौड़ी आई मैया बधाई हैं बोली बहनाओ बार बार सबन कुं बधाई हैं। पर ज्यादा हल्ला मत मचाओ, मेरो लाल आभाळ सोयो है, जाग जायेगो अभालई सोयो। गोपियाँ बोली- जब सोरई न करनो तो हमे काय को बुलायो है। अब बधाइयां गावेगी तो सोर तो मचेगो ही। तब मैया ने सोते हुए लाला को पालना उठायों और थोड़ी दूर पर एक छकड़े के नीचे रख दियो। आँगन ते माट मटका उठाए व गाड़ी के ऊपर धर दीन्हों। बोली- अब प्रेम ते नाचो, गाओ, बजाओ कोई चिंता की बात नहीं। अब गोपियां ठुमक-ठुमक के नाचवे गावें लगी। 

सोई लाला की नींद खुल गई, नींद खुलते ही लाला ने चारों तरफ देखो, वाह!.. गीत गब रहे हैं। और जिनके लिए गीत गब रहे हैं, वो आंगन में लटक रहे हैं। बहुत देर के बाद जब भगवान ने देखा हमें तो कोई देख ही नहीं रहा, सब अपने में ही खोये है। तब भगवान ने रोना शुरू किया। अब रोने पर भी जब कोई देखने वाला नहीं, तो गुस्से में मारी एक लात गाड़ी में तो गाड़ी दूरsss.. जाके गिरी और उसी गाड़ी में था एक सकटासुर सो उसका भी गोविन्दाय नमो नमः।


माखन से भरे जितने घड़ा थे सब फूट गए। बोल नन्द के लाला की। मैया ने देखी अब तो टूटी गाड़ी फूटे मटका अरे राम-राम! देखा तो लाला पालने खेलते भये। लपक के मैया ने लाला को गोद में ले लियो देखो लाला तो मेरो ठीक-ठाक दीखे। बड़ो संतोष भयो। पर आंधी तो चली ना, तूफान आयो ना गाड़ी खड़ी-खड़ी कैसे उछल गयी। तवई दो छोरा दौड़ें-दौड़ें आए बोले- मैया! हम बतावें?.. हाँ.. बताओ बेटा! 

बोलो- मैया हम बाई खड़े भये और तुम सब नाचबे में लगी। तासे लाला की नींद खुली तो मानो सबसे पहले रोबो चालू करो। मैंने सोंची याकू उठाए के तुमको देई आऊँ और जबई मैं आगे बढ्यो, याने गाड़ी में एक लात मारी की धम्म से गाड़ी आकाश में चली गई। 

मइया बोली- दारी के भाग यहाँ से, भांग खा के तो न आयो। कल को छोरा, पैदा होवे की देरी ना भई और लात मार के गाड़ी आकाश में उड़ा दी। चल भाग यहाँ से, डांट के सभी को भगाया और छोरा सौगंध खाएं-खाएं के परेशान। मैया तेरे सिर की सौगन्ध हम साची बोले। 

पर मैया की तो चले काऊ ब्रजबासी ने बात नाय मानी। तुरंत मैया ने ब्राह्मण को बुलायो, गृह शांति का अनुष्ठान करायो दक्षिणा दीन्ही ब्राह्मणन ने आशीर्वाद दी। मैया तू चिंता नाय कर हम आशीर्वाद दे रहे हैं, यापे काऊ की अला-बला नाय आ सके, या खुद अपनी अला-बला को दूर फेंकेगो। ऐसो आशीर्वाद देके ब्राह्मण चले गए। इस प्रकार से प्रभु ने सकट भंजन किया।

एक दिन मैया लाला को खूब उछाल-उछाल के खिलाय रही, कन्हैया बड़े प्रसन्न पर उछालवो बंद करे सोई रोबे लगे। मैया परेशान कब तक उछालूं थक गयी, सो स्तनपान कराईबे लगी। तब तिरछी निगाह से देखा, ओहो मामाजी ने एक और खिलौना भेज दियो हमारे ताई। 

कन्हैया ने क्या देखा कि तृणावर्त जी आरहे हैं। अब माताजी तो उछाल रही है नहीं। तब कन्हैया ने माया के द्वारा अपना वजन बढ़ाया। बजन बढ़ा भगवान का तो माता से संभाले न सम्हले मईया ने सोची अरे काह है गयो या छोरा कुं।

अरे काह भयो या छोरा कुं इतनो बजन हो गयो। अब जैसे ही माता ने छोरा को जमीन पर बैठाया वैसे ही वह तृणावर्त कन्हैया को अपने हाथों से उठाकर आकाश में ले गया। भगवान ने उसके गले को पकड़कर जैसे ही दवाया उसके भी प्राण पखेरू उड़ गए इस तरह से भगवान ने यहाँ पर तृणावर्त का भी उद्धार किया। मैया ने झटपट लाला को उठाया गोद में और गले से लगाया। बोली- पतो नाय कहा को बला है जो मेरे लाला को हाथ धोए के पीछे पड़्यो हैं। 

मैया ने फिर से लाला की झाड़ फूंक किया, स्नान करायो काजर लगा के डिठौरा लगाया और फिर से दूध पीलावे लगी तभी दूध पीते पीते कन्हैया ने जम्भाई ली और मैया ने यहाँ पर तीनों लोकन के दर्शन लाल के मुख्य मंडल में कर लियो।